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विकास के दावों के बीच बदहाल नगड़ी: खटिया बन रही एम्बुलेंस, 5 साल से प्यासे हैं चापाकल

रिपोर्ट: Amit Sahay5 घंटे पहलेझारखण्ड

लगभग 190 फीट सड़क में सिर्फ 30 फीट सोलिंग, अधूरी पुलिया टूटने लगी

विकास के दावों के बीच बदहाल नगड़ी: खटिया बन रही एम्बुलेंस, 5 साल से प्यासे हैं चापाकल

गिरिडीह : "जल-जंगल-जमीन" के नारों और आदिवासी नेतृत्व के दावों के बीच झारखंड के गिरिडीह जिले का नगड़ी गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं को तरस रहा है। तिसरी प्रखंड की लोकाय पंचायत स्थित इस आदिवासी बहुल गांव में 35 परिवार रहते हैं, पर न पक्की सड़क है, न स्वच्छ पेयजल।

गांव में दो साल पहले 15वें वित्त आयोग के तहत 190 फीट लंबी पीसीसी सड़क और पुलिया का निर्माण शुरू हुआ था। मगर आज हालत यह है कि सड़क पर महज 20-30 फीट ईंट सोलिंग कर काम छोड़ दिया गया। अधूरी पुलिया निर्माण के साथ ही टूटने लगी है।

योजना अध्यक्ष मनीष बेसरा के मुताबिक तत्कालीन पंचायत सेवक दुल्ल्ड मराण्डी के कार्यकाल में काम के लिए 88 हजार रुपये निकाले गए। आरोप है कि ईंट खरीद में ज्यादा भुगतान के चलते फंड खत्म हो गया। इधर पंचायत स्तर से फंड दूसरे खाते में ट्रांसफर होने की बात कहकर काम रोक दिया गया है।

**प्रतिनिधि -कर्मी एक दूसरे पर डाल रहे जिम्मेदारी **

मुखिया प्रतिनिधि तालो हांसदा ने माना कि पुलिया और पीसीसी पथ उनके कार्यकाल का है। उनका कहना है कि योजना फाइनल नहीं हुई और पीसीसी पथ में करीब एक लाख रुपये निकले हैं। तत्कालीन जेई दीपक कुमार ने एमबी बुक नहीं किया, जिसकी शिकायत प्रखंड कार्यालय में की गई है।

वहीं तत्कालीन जेई दीपक कुमार का तर्क है कि फंड नहीं होने से एमबी बुक नहीं हो पाया। तिसरी के बीडीओ मनीष कुमार ने कहा कि मामला संज्ञान में आया है और जांच के बाद कार्रवाई होगी।

**खटिया पर लादकर ले जाते हैं मरीज **

नगड़ी पहुंचने का एकमात्र रास्ता पगडंडी है। सड़क नहीं होने से एम्बुलेंस या कोई वाहन गांव तक नहीं पहुंचता। ग्रामीण मंझलू सोरेन बताते हैं, "कोई गंभीर बीमार पड़ जाए तो खटिया पर लादकर उसे मुख्य सड़क तक ले जाते हैं।" बरसात में तो गांव का बाहरी दुनिया से संपर्क ही कट जाता है।

**5 साल से खराब पड़े हैं दोनों चापाकल **

पेयजल का संकट भी गहरा है। ग्रामीण महिला ऐंती मुर्मू और मंझलू सोरेन के अनुसार गांव के दोनों चापाकल पिछले 5 साल से खराब हैं। मरम्मत की कोई पहल नहीं हुई। मजबूरी में महिलाएं दूर स्थित कुएं से पानी लाती हैं। ग्रामीणों की मांग ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सड़क, पुलिया निर्माण पूरा करने और पेयजल व्यवस्था दुरुस्त करने की मांग की है। सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री से लेकर विधायक और मुखिया तक आदिवासी हैं, तब भी आदिवासी गांवों की यह हालत क्यों? आखिर सरकारी फंड "धूप में पानी की बूंद" की तरह क्यों सूख जाता है?

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