रांची में रात-रात भर अलाव, सरायकेला-खरसावां में एक दिन की औपचारिक गर्माहट
शीतलहर में संवेदनशीलता की परीक्षा, कहीं प्रशासन मैदान में, कहीं अलाव सिर्फ कागजों में

सरायकेला : झारखंड में कड़ाके की ठंड और शीतलहर ने जनजीवन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। एक ओर रांची जिला प्रशासन जरूरतमंदों, बेसहारा और असहाय लोगों को ठंड से बचाने के लिए लगातार सक्रिय नजर आ रहा है, वहीं दूसरी ओर सरायकेला-खरसावां जिले में अलाव की व्यवस्था को लेकर प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां अलाव की व्यवस्था महज एक दिन कर औपचारिकता निभा दी गई जबकि ठंड का प्रकोप लगातार जारी है। रांची जिले में जिला प्रशासन ने शीतलहर को गंभीरता से लेते हुए व्यापक इंतजाम किए हैं। जिले के सभी प्रखंडों और शहरी क्षेत्र के प्रमुख चौक-चौराहों पर नियमित रूप से अलाव जलाए जा रहे हैं। उपायुक्त मंजूनाथ भजन्त्री स्वयं रात में शहर का निरीक्षण कर रहे हैं और जरूरतमंदों के बीच कंबल बांट रहे हैं। वृद्धा आश्रम से लेकर सड़क किनारे रहने वाले बेसहारा लोगों तक प्रशासन की सीधी पहुंच देखने को मिल रही है। इसके विपरीत सरायकेला-खरसावां जिले में स्थिति अलग नजर आती है। यहां अलाव की व्यवस्था केवल एक दिन कर दी गई, जिसके बाद ठंड में ठिठुरते लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। फुटपाथों, बस स्टैंडों और चौक-चौराहों पर रात बिताने वाले गरीब, मजदूर और असहाय लोग ठंड से कांपते रहे, लेकिन प्रशासनिक अमला नजर नहीं आया। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि ठंड एक दिन में खत्म नहीं होती, फिर अलाव एक दिन का क्यों? रांची प्रशासन ने जहां लोगों से अपील की है कि ठंड से पीड़ित किसी भी बेसहारा व्यक्ति की सूचना तुरंत नियंत्रण कक्ष को दें, वहीं सरायकेला-खरसावां में ऐसी कोई सक्रिय अपील या सतत अभियान दिखाई नहीं देता। यह अंतर साफ दर्शाता है कि शीतलहर से बचाव केवल आदेश या फोटो तक सीमित नहीं होना चाहिए। ठंड के इन दिनों में जरूरत है निरंतर निगरानी और मानवीय संवेदनशीलता की ताकि सरायकेला-खरसावां के जरूरतमंद भी यह न कहें कि राहत तो आई थी… बस एक दिन के लिए।