एक शिव, दो परंपराएं : आखिर क्यों अलग-अलग तिथियों से शुरू होता है सावन?
पंचांग का फेर या परंपरा का वैभव? 18 जुलाई से बंगाली समाज और 30 जुलाई से उत्तर भारतीय श्रद्धालु करेंगे भगवान शिव की आराधना

जादूगोड़ा (सौरभ कुमार) : श्रावण मास भारतीय सनातन संस्कृति का वह पवित्र काल है जब पूरा वातावरण हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठता है। भगवान शिव की आराधना, जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, व्रत, उपवास और कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों के कारण सावन को सबसे पवित्र महीनों में माना जाता है। लेकिन वर्ष 2026 में सावन को लेकर एक रोचक स्थिति देखने को मिल रही है। इस बार बंगाली समुदाय और उत्तर भारतीय श्रद्धालु अलग-अलग तिथियों से सावन की शुरुआत करेंगे। जहां बंगाली समाज 18 जुलाई 2026 से श्रावण मास का शुभारंभ मानेगा वहीं बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और उत्तर भारत की पूर्णिमांत परंपरा का पालन करने वाले श्रद्धालु 30 जुलाई 2026 से सावन मास प्रारंभ करेंगे। पहली नजर में यह अंतर लोगों के मन में भ्रम उत्पन्न कर सकता है लेकिन धर्मशास्त्र और ज्योतिष के जानकार स्पष्ट करते हैं कि यह किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं बल्कि भारतीय पंचांग परंपराओं की विविधता और समृद्ध वैज्ञानिक गणना का परिणाम है।
दो पंचांग, दो गणना पद्धतियां
जादूगोड़ा के विद्वान पंडित देवव्रतो पहाड़ी और पंचांग विशेषज्ञों के अनुसार भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार की पंचांग प्रणालियां प्रचलित हैं - सौर पंचांग और चंद्र पंचांग। बंगाली समाज प्रायः सौर आधारित पंचांग का अनुसरण करता है। इस पद्धति में सूर्य की राशि परिवर्तन अर्थात कर्क संक्रांति से श्रावण मास का आरंभ माना जाता है। वर्ष 2026 में सूर्य 18 जुलाई को कर्क राशि में प्रवेश करेगा, इसलिए बंगाली पंचांग के अनुसार इसी दिन से श्रावण मास प्रारंभ होकर 18 अगस्त 2026 तक रहेगा। दूसरी ओर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और उत्तर भारत के अधिकांश श्रद्धालु पूर्णिमांत चंद्र पंचांग का पालन करते हैं। इसमें आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन से सावन कृष्ण पक्ष प्रारंभ होता है। उदयातिथि के आधार पर इस वर्ष उत्तर भारतीय परंपरा के अनुसार सावन मास 30 जुलाई से 28 अगस्त 2026 तक रहेगा।
दोनों परंपराएं पूरी तरह मान्य
धार्मिक विद्वानों का स्पष्ट मत है कि दोनों पंचांग अपनी-अपनी परंपरा, गणना और शास्त्रीय आधार पर पूरी तरह प्रमाणिक हैं। इसलिए किसी एक तिथि को सही और दूसरी को गलत कहना उचित नहीं होगा। भारत की सांस्कृतिक विविधता की यही विशेषता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में पंचांग की पद्धति भिन्न होने के बावजूद श्रद्धा का केंद्र एक ही रहता है - भगवान शिव।
पंडित देवव्रतो पहाड़ी बताते हैं कि सनातन धर्म में पंचांग केवल तिथियों का निर्धारण नहीं करता बल्कि यह हजारों वर्षों से चली आ रही क्षेत्रीय परंपराओं, सामाजिक मान्यताओं और खगोलीय गणनाओं का समन्वय है। इसलिए प्रत्येक समाज अपनी पारिवारिक और पारंपरिक मान्यता के अनुसार पूजा-अर्चना करता है।
जादूगोड़ा के मंदिरों में दिखेगा दो चरणों में सावन का उत्साह
जादूगोड़ा और आसपास के क्षेत्रों में बंगाली तथा उत्तर भारतीय दोनों समुदाय बड़ी संख्या में निवास करते हैं। ऐसे में इस वर्ष यहां के शिवालय लगभग डेढ़ महीने तक सावन की भक्ति से सराबोर रहेंगे। 18 जुलाई से बंगाली समुदाय की ओर से शिव मंदिरों में विशेष पूजा, जलाभिषेक, बेलपत्र अर्पण, रुद्रपाठ और भजन-कीर्तन का सिलसिला शुरू हो जाएगा। मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी और प्रतिदिन भगवान शिव का विशेष श्रृंगार किया जाएगा। इसके बाद 30 जुलाई से उत्तर भारतीय श्रद्धालु भी सावन मास की शुरुआत करेंगे। इस दौरान सोमवार के व्रत, कांवड़ जलाभिषेक, महामृत्युंजय जाप और शिव आराधना का विशेष महत्व रहेगा।
सोमवारों का भी अलग रहेगा महत्व
इस वर्ष बंगाली पंचांग के अनुसार श्रावण मास में पांच सोमवार पड़ रहे हैं जिन्हें अत्यंत शुभ माना जा रहा है। वहीं उत्तर भारतीय परंपरा के अनुसार पहला सावन सोमवार 3 अगस्त 2026 को रहेगा। इसके बाद लगातार श्रद्धालु भगवान शिव की पूजा-अर्चना, व्रत और जलाभिषेक करेंगे। धार्मिक मान्यता है कि सावन सोमवार का व्रत रखने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। अविवाहित युवतियां योग्य वर की प्राप्ति तथा विवाहित महिलाएं परिवार की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत रखती हैं।
सावन का आध्यात्मिक संदेश
श्रावण मास केवल पूजा-पाठ का समय नहीं बल्कि आत्मसंयम, सेवा, श्रद्धा और प्रकृति के प्रति आस्था का भी पर्व है। वर्षा ऋतु के बीच आने वाला यह महीना मनुष्य को संयमित जीवन, सात्विक आहार, धार्मिक साधना और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। शिव स्वयं त्याग, करुणा, धैर्य और समभाव के प्रतीक हैं। इसलिए सावन का मूल संदेश भी यही है कि समाज में भेदभाव नहीं बल्कि श्रद्धा और सद्भाव का विस्तार हो।
वर्ष 2026 का सावन एक बार फिर भारतीय संस्कृति की उस सुंदर विशेषता को सामने ला रहा है जहां विविध परंपराएं होने के बावजूद आस्था का केंद्र एक ही है। चाहे 18 जुलाई से बंगाली पंचांग के अनुसार पूजा आरंभ हो या 30 जुलाई से उत्तर भारतीय परंपरा के अनुसार दोनों ही मार्ग भगवान शिव की भक्ति तक पहुंचाते हैं। इस वर्ष जादूगोड़ा सहित पूरे क्षेत्र के शिवालय लगभग डेढ़ महीने तक भक्तों की आस्था से गुलजार रहेंगे। अलग-अलग पंचांग, अलग-अलग तिथियां, लेकिन एक ही उद्घोष पूरे वातावरण में गूंजेगा...
हर-हर महादेव... बोल बम... जय भोलेनाथ!