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बरसात के साथ बाजारों में लौटा जंगल का सफेद सोना, रुगड़ा खरीदने उमड़ रही लोगों की भीड़

रिपोर्ट: VBN News Desk1 दिन पहलेआर्टिकल

आदिवासी संस्कृति और जंगल की अनमोल सौगात है रुगड़ा, जादूगोड़ा के हाट-बाजारों में बढ़ी मांग

बरसात के साथ बाजारों में लौटा जंगल का सफेद सोना, रुगड़ा खरीदने उमड़ रही लोगों की भीड़

जादूगोड़ा (सौरभ कुमार) : बरसात की पहली फुहार के साथ ही झारखंड के जंगल एक बार फिर अपनी अनमोल प्राकृतिक संपदा से आबाद हो उठे हैं। नम मिट्टी के भीतर स्वतः उगने वाला रुगड़ा (पुटका) इन दिनों जादूगोड़ा और आसपास के क्षेत्रों के हाट-बाजारों की रौनक बढ़ा रहा है। अपने विशेष स्वाद, पौष्टिक गुणों और सीमित उपलब्धता के कारण रुगड़ा को झारखंड का जंगल का सफेद सोना कहा जाता है। बारिश का मौसम शुरू होते ही इसकी मांग इतनी बढ़ जाती है कि बाजार में पहुंचते ही अधिकांश रुगड़ा कुछ ही घंटों में बिक जाता है। रुगड़ा केवल एक मौसमी खाद्य पदार्थ नहीं बल्कि झारखंड की आदिवासी संस्कृति, जंगल और प्रकृति से गहरे जुड़ी जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है। वर्षों से आदिवासी परिवार इसे जंगलों से संग्रहित कर अपने भोजन और आजीविका का महत्वपूर्ण साधन बनाते आ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि रुगड़ा प्रकृति का ऐसा उपहार है जो केवल बरसात के शुरुआती दिनों में ही जंगल की नम मिट्टी के भीतर मिलता है। इसलिए इसकी उपलब्धता सीमित होती है और यही वजह है कि इसकी कीमत भी सामान्य सब्जियों की तुलना में अधिक रहती है। जादूगोड़ा मोड़ सहित आसपास के बाजारों में इन दिनों सुबह से ही महिला और पुरुष टोकरी में ताजा रुगड़ा लेकर बिक्री करते नजर आते हैं। कई ग्रामीण परिवार भोर होते ही जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं और घंटों की मेहनत के बाद मिट्टी में छिपा रुगड़ा खोजकर बाजार तक पहुंचाते हैं। खरीदार भी ताजा रुगड़ा लेने के लिए सुबह-सुबह बाजार पहुंच रहे हैं। स्थानीय लोगों के अलावा आसपास के कस्बों और गांवों से भी लोग इसकी खरीदारी के लिए पहुंच रहे हैं। रुगड़ा से बनने वाली पारंपरिक सब्जी अपने अनोखे स्वाद और पौष्टिकता के लिए प्रसिद्ध है। स्थानीय घरों के साथ-साथ होटल और ढाबों में भी इसकी विशेष मांग रहती है। कई परिवार पूरे साल बरसात का इंतजार केवल रुगड़ा का स्वाद लेने के लिए करते हैं। यही कारण है कि बाजार में इसकी आवक होते ही लोगों में इसे खरीदने की होड़ लग जाती है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार रुगड़ा प्रोटीन, खनिज लवण और कई आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर होता है। यही वजह है कि इसे स्वादिष्ट होने के साथ-साथ स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ भी माना जाता है। जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला यह खाद्य पदार्थ पूरी तरह जैविक होता है और किसी प्रकार की रासायनिक प्रक्रिया से नहीं गुजरता। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि रुगड़ा केवल भोजन नहीं बल्कि जंगल और इंसान के बीच सदियों पुराने रिश्ते का प्रतीक है। यह प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने और उसके संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करने की सीख भी देता है। बरसात के मौसम में मिलने वाली यह प्राकृतिक सौगात आज भी झारखंड की सांस्कृतिक पहचान और आदिवासी जीवन की अमूल्य धरोहर बनी हुई है। जंगलों की गोद से निकलकर बाजार तक पहुंचने वाला रुगड़ा न केवल लोगों की थाली का स्वाद बढ़ा रहा है बल्कि स्थानीय ग्रामीणों की आजीविका का भी महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है।

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