विकास का प्रतीक डैम बना विस्थापितों के लिए अभिशाप, चांडिल-ईचा डैम विस्थापितों की पीड़ा पर आरक्षित वन का नया जख्म
हक छीने गए, जंगल का ठप्पा लगाया गया, चांडिल-ईचा डैम विस्थापितों की पीड़ा बन रही सियासी सवाल

चांडिल और ईचा डैम परियोजनाओं से विस्थापित हजारों परिवारों का दर्द एक बार फिर सामने आ गया है। झारखंड सरकार के वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा 17 सितंबर 2010 को जारी अधिसूचना के तहत चांडिल और ईचा डैम के निर्माण से डूबी भूमि को आरक्षित वन घोषित किए जाने के निर्णय ने विस्थापितों की पीड़ा को और गहरा कर दिया है। वर्षों से अपने हक और पुनर्वास की राह देख रहे परिवारों के लिए यह फैसला एक नई चिंता बनकर उभरा है। आंकड़ों के अनुसार चांडिल डैम क्षेत्र की लगभग 46,477 एकड़ और ईचा डैम क्षेत्र की करीब 25,212 एकड़ भूमि को वन क्षेत्र घोषित किया गया है। यही वह जमीन है जिस पर कभी गांव बसे थे, खेत लहलहाते थे और हजारों परिवार पीढ़ियों से अपनी आजीविका चलाते थे। डैम निर्माण के नाम पर इन लोगों को उजाड़ दिया गया लेकिन बदले में न समुचित मुआवजा मिला, न रोजगार और न ही जमीन के बदले जमीन। विस्थापितों का आरोप है कि अब उसी डूबी हुई भूमि को वन घोषित कर दिए जाने से उन्हें अतिक्रमणकारी की नजर से देखा जा रहा है। इससे न सिर्फ उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब यह जमीन पहले से ही डैम परियोजना में समाहित थीं तो उसे आरक्षित वन घोषित करने का निर्णय किसके हित में है। डैम विस्थापित नेता राकेश रंजन महतो ने इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि विस्थापितों के साथ वर्षों से अन्याय हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जनप्रतिनिधियों और नीति-निर्माताओं को इस स्थिति की जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई। उन्होंने पूछा कि क्या क्षेत्र के विधायक और सांसद इस अधिसूचना से अनजान हैं या जानबूझकर चुप्पी साधी गई है। इधर चांडिल रेंज क्षेत्र में जंगली हाथियों का बढ़ता आतंक विस्थापित और ग्रामीण परिवारों की मुश्किलें और बढ़ा रहा है। फसलें नष्ट हो रही हैं, जान का खतरा बना हुआ है और गांव भय के साये में जी रहे हैं। राकेश रंजन महतो ने कहा कि मौत या नुकसान के बाद मुआवजा देना समाधान नहीं है बल्कि स्थायी रोकथाम जरूरी है। उन्होंने फसल क्षति मुआवजे को भी नाकाफी बताया। उन्होंने वन क्षेत्रों में अवैध खनन, लकड़ी की तस्करी और पौधारोपण की कमी पर भी सवाल उठाए। स्थानीय स्तर पर अब यह मांग तेज हो रही है कि डैम विस्थापितों से जुड़ी इस अधिसूचना की पुनः समीक्षा हो और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए व्यावहारिक नीति बनाई जाए। अब देखना होगा कि सरकार इन जख्मी आवाज़ों को सुनती है या विस्थापितों का दर्द यूं ही अनसुना रह जाएगा।