कोटाल पोखर का अफराहीम अब दिल्ली के साउथ एशियन यूनिवर्सिटी से गहड़ेंगे नई कहानी
मोहम्मद अफराहीम अब इंटरनेशनल रिलेशंस में शोध करेंगे। दक्षिण एशिया की राजनीति, कूटनीति, क्षेत्रीय सहयोग, देशों के आपसी संबंध और बदलती वैश्विक परिस्थितियां उनके अकादमिक सफर का हिस्सा होंगी।

Ajay Kumar पाकुड़। पाकुड़ विधानसभा के कोटालपोखर कस्बे का अफराहिम अब गांव की गलियों से निकलकर दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच पर पहुंच गया हैं।साहेबगंज जिले के कोटाल पोखर गांव निवासी मोहम्मद अफराहीम ने अपनी मेहनत,लगन और शैक्षणिक प्रतिभा के बदौलत एक बड़ी कामयाबी हासिल की है।
अफराहिम का नामांकन अब नई दिल्ली स्थित साउथ एशियन यूनिवर्सिटी (SAU) के डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस में पीएचडी (रिसर्च स्कॉलर) के लिए हुआ है। अफराहिम की इस उपलब्धि से ना सिर्फ परिवार में खुशी है, बल्कि पूरा कोटाल पोखर से लेकर पूरे साहेबगंज के लिए गौरव की बात बन गई है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर दक्षिण एशिया के आठ देशों द्वारा स्थापित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में शोध के लिए पहुंचना अपने आप में एक प्रेरणादायक सफर है।
जिस दक्षिण एशिया को किताबों में पढ़ा, अब उसी पर करेंगे शोध
मोहम्मद अफराहीम अब इंटरनेशनल रिलेशंस में शोध करेंगे। दक्षिण एशिया की राजनीति, कूटनीति, क्षेत्रीय सहयोग, देशों के आपसी संबंध और बदलती वैश्विक परिस्थितियां उनके अकादमिक सफर का हिस्सा होंगी।इस शोध की खासियत यह होगी कि अफराहीम जिस क्षेत्र का अध्ययन करेंगे, उसी क्षेत्र के विभिन्न देशों से आए विद्यार्थियों और शोधार्थियों के बीच रहकर उसे समझने का अवसर भी उन्हें मिलेगा।यानी दक्षिण एशिया अब सिर्फ किताबों का विषय नहीं रहेगा, बल्कि अफराहीम के शोध और अनुभव का जीवंत हिस्सा बनेगा।
एक विश्वविद्यालय,आठ देशों की साझी सोच
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी कोई सामान्य विश्वविद्यालय नहीं है। इसकी स्थापना SAARC के आठ सदस्य देशों भारत, पाकिस्तान,बांग्लादेश,नेपाल,भूटान, श्रीलंका,मालदीव और अफगानिस्तान ने मिलकर की है।विश्वविद्यालय की परिकल्पना वर्ष 2005 में आयोजित 13वें सार्क समिट में सामने आई थी और वर्ष 2010 में इसका अकादमिक संचालन शुरू हुआ।इसका मूल उद्देश्य दक्षिण एशिया के देशों के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को एक साझा शैक्षणिक मंच देना तथा शिक्षा और शोध के माध्यम से क्षेत्रीय समझ और सहयोग को बढ़ावा देना है।
जहां हर देश की सोच से होता है सामना
साऊ का कैंपस दक्षिण एशिया की विविधता का एक जीवंत उदाहरण है। अलग-अलग देशों से आने वाले विद्यार्थी और शिक्षक अपने साथ अलग-अलग भाषाएं, संस्कृतियां, राजनीतिक अनुभव और सामाजिक दृष्टिकोण लेकर आते हैं। इंटरनेशनल रिलेशंस के शोधार्थी के लिए यह अनुभव बेहद महत्वपूर्ण है। यहां किसी देश को केवल किताबों या आंकड़ों के जरिए समझने के बजाय उस देश से आए व्यक्ति के नजरिए को सीधे समझने का अवसर मिलता है।यही वजह है कि अफराहीम का यह अकादमिक सफर उनके शोध को एक व्यापक और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण देने वाला साबित हो सकता है।
गांव के युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा
मोहम्मद अफराहीम की यह उपलब्धि उन युवाओं के लिए भी उम्मीद की एक बड़ी किरण है, जो छोटे शहरों और गांवों से निकलकर बड़े सपने देखते हैं।कोटाल पोखर से नई दिल्ली तक का यह सफर एक संदेश देता है सपनों की ऊंचाई जगह की सीमाओं से तय नहीं होती। मेहनत,निरंतरता और शिक्षा के प्रति जुनून हो तो गांव की मिट्टी से निकला युवा भी अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच पर अपनी पहचान बना सकता है. अफराहीम का पीएचडी के लिए चयन आने वाले वर्षों में उनके अकादमिक जीवन की दिशा तय करेगा। साथ ही उनके शोध के जरिए साहेबगंज जैसे क्षेत्र का एक युवा दक्षिण एशिया से जुड़े महत्वपूर्ण विमर्श में अपनी आवाज भी जोड़ सकेगा।
कोटाल पोखर से निकला एक सपना, अब दक्षिण एशिया तक पहुंचेगा
एक तरफ कोटाल पोखर की स्थानीय पहचान,दूसरी तरफ नई दिल्ली का अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय—इन दोनों के बीच खड़ा है मोहम्मद अफराहीम का संघर्ष, शिक्षा और सफलता का सफर।