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पेसा के नाम पर धोखा! आदिवासी अधिकारों की कटौती को लेकर झारखंड सरकार और टाटा पर चंपई सोरेन का तीखा हमला

रिपोर्ट: MANISH 1 दिन पहलेझारखण्ड

चंपाई सोरेन का एलान - यह पेसा नहीं, ठगने की नियमावली है, राज्यभर में आंदोलन की चेतावनी

पेसा के नाम पर धोखा! आदिवासी अधिकारों की कटौती को लेकर झारखंड सरकार और टाटा पर चंपई सोरेन का तीखा हमला

गम्हरिया : झारखंड में पेसा अधिनियम की नियमावली को लेकर सियासी और सामाजिक घमासान तेज हो गया है। राज्य सरकार द्वारा हाल ही में लागू की गई पेसा नियमावली को आदिवासी समाज ने अपने अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है। इसी क्रम में गम्हरिया स्थित संथाल सरना उमूल (जाहेरस्थान) में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने झारखंड सरकार के साथ-साथ टाटा कंपनी को भी कठघरे में खड़ा किया।

पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि सरकार ने पेसा अधिनियम लागू तो किया लेकिन उसकी नियमावली को लंबे समय तक छिपाए रखा। हाई कोर्ट के दबाव और विपक्षी आंदोलनों के बाद जो नियमावली सामने आई वह आदिवासी समाज के साथ “संवैधानिक धोखा” है। उन्होंने कहा कि इस नियमावली में पेसा की मूल आत्मा रूढ़िजन्य विधि, सामाजिक-धार्मिक परंपराएं और पारंपरिक ग्राम सभा को जानबूझकर कमजोर किया गया है।

चंपाई सोरेन ने कहा कि भारतीय संविधान की धारा 13(3)(क) और सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसले आदिवासियों की रूढ़िजन्य परंपराओं को कानूनी मान्यता देते हैं फिर भी झारखंड सरकार ने इन्हें नियमावली से बाहर कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब अदालतें आदिवासियों की धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करती हैं (जैसे ओडिशा के नियमगिरि पर्वत मामले में वेदांता परियोजना को रोका गया) तो झारखंड सरकार को इससे आपत्ति क्यों है?

पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि नई नियमावली में ग्राम सभा के अधिकारों को सुनियोजित तरीके से सीमित किया गया है। पहले जहां जल, जंगल, जमीन और लघु खनिजों पर ग्राम सभा का अधिकार था अब उसे सिर्फ सरना, मसना और जाहेरस्थान तक समेट दिया गया है। योजनाओं और DMFT जैसे कार्यक्रमों में ग्राम सभा की स्वीकृति को औपचारिकता बना दिया गया है क्योंकि 30 दिन में सहमति न देने पर उसे स्वतः स्वीकृत मान लिया जाएगा।

उन्होंने कहा कि इससे शेड्यूल एरिया में उपायुक्त को सर्वशक्तिमान बना दिया गया है और पारंपरिक स्वशासन की अवधारणा खत्म हो रही है। CNT-SPT कानून के उल्लंघन पर भूमि वापसी जैसे अधिकार भी हटा दिए गए हैं जो यह दर्शाता है कि सरकार की प्राथमिकता आदिवासी नहीं बल्कि उद्योग और कंपनियां हैं।

टाटा कंपनी का नाम लेते हुए चंपाई सोरेन ने चांडिल डैम का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि टाटा को पानी उपलब्ध कराने के लिए बनाए गए इस डैम में 116 गांव डूब गए लेकिन विस्थापितों को आज तक न्याय नहीं मिला। जमशेदपुर जिन भूमिपुत्रों की जमीन पर बसा है वे आज हाशिये पर हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कंपनियां अरबों कमाएं और आदिवासी उजड़ते रहें तो ऐसे औद्योगिक विकास का क्या अर्थ है? उन्होंने टाटा लीज के नवीनीकरण की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग की और कहा कि पेसा के नाम पर शेड्यूल एरिया में शराब नीति से लेकर उद्योगों तक सरकार को सब याद रहा लेकिन विस्थापितों और आदिवासी अधिकारों की चिंता नहीं हुई। चंपाई सोरेन ने स्पष्ट किया कि इस अधूरी और छलपूर्ण पेसा नियमावली के खिलाफ राज्यभर में जनजागरण अभियान चलाया जाएगा और इसकी शुरुआत कालिकापुर पंचायत से होगी। उन्होंने चेतावनी दी कि आदिवासियों की भावनाओं और अधिकारों से खिलवाड़ के खिलाफ हर स्तर पर संघर्ष होगा।

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