ताज़ा-ख़बर

तत्कालीन एसपी मुकेश लुनायत के तीन पत्रों से खुला विभागीय जांच का रिकॉर्ड, शुभंकर कुमार के आवेदनों और मीडिया रिपोर्ट पर कराई गई थी विभागीय जांच

रिपोर्ट: MANISH 17 घंटे पहलेझारखण्ड

न्यायालय जाने के लिए भी पुलिस को विभागीय मंजूरी की मजबूरी, एएसआई शुभंकर कुमार के मामले ने पुलिस व्यवस्था पर खड़े किए कई सवाल

तत्कालीन एसपी मुकेश लुनायत के तीन पत्रों से खुला विभागीय जांच का रिकॉर्ड, शुभंकर कुमार के आवेदनों और मीडिया रिपोर्ट पर कराई गई थी विभागीय जांच

सरायकेला-खरसावां : जिले में पदस्थापित एएसआई शुभंकर कुमार का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। वर्ष 2022 से लेकर जुलाई 2026 तक उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि उन्होंने अपने विभागीय विवाद और न्यायिक लड़ाई के संबंध में लगातार वरीय अधिकारियों से अवकाश, अनुमति और न्यायालय जाने की स्वीकृति मांगी। अब तत्कालीन पुलिस अधीक्षक मुकेश लुनायत द्वारा जारी तीन अलग-अलग आधिकारिक पत्र भी सामने आए हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि शुभंकर कुमार द्वारा दिए गए आवेदनों और मीडिया में प्रकाशित खबरों को गंभीरता से लेते हुए विभागीय जांच के निर्देश दिए गए थे। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार 23 मार्च 2022 को शुभंकर कुमार ने पुलिस अधीक्षक, सरायकेला-खरसावां तथा तत्कालीन डीआईजी, सिंहभूम (कोल्हान) क्षेत्र को अलग-अलग आवेदन देकर तत्कालीन पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध रांची हाईकोर्ट में कानूनी कार्यवाही करने के लिए आवश्यक अवकाश एवं अनुमति का अनुरोध किया था। उन्होंने अपने आवेदन में कहा था कि विभागीय अपीलों का समय पर निष्पादन नहीं होने के कारण उन्हें न्यायालय की शरण लेनी पड़ रही है। इसके बाद 30 जून 2026 को उन्होंने पुनः हाईकोर्ट में अपने मामले की पैरवी के लिए अवकाश का आवेदन दिया। वहीं 9 जुलाई 2026 को उन्होंने मीडिया के समक्ष अपना पक्ष रखने के लिए भी विभाग से विधिवत अनुमति मांगी। इससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने प्रत्येक स्तर पर विभागीय प्रक्रिया का पालन करते हुए लिखित अनुमति लेने का प्रयास किया। इसी बीच तत्कालीन पुलिस अधीक्षक मुकेश लुनायत द्वारा जारी तीन आधिकारिक पत्र भी सामने आए हैं। इनमें 24 दिसंबर 2024 के पत्र में शुभंकर कुमार द्वारा प्रस्तुत आवेदन के आधार पर प्रारंभिक तथ्यों की जांच कर एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था। आवेदन में वर्ष 2024 के आकस्मिक अवकाश (सीएल) उपयोग नहीं कर पाने तथा संबंधित राशि उपलब्ध कराने जैसे मुद्दों का उल्लेख था। इसके बाद 7 जनवरी 2025 के एक अन्य पत्र में आरआईटी थाना से संबंधित सोशल मीडिया पर वायरल ऑडियो, वीडियो और समाचार के संदर्भ में गहन जांच करने तथा सूक्ष्म एवं विस्तृत जांच प्रतिवेदन समर्पित करने का निर्देश दिया गया। इस पत्र में वायरल समाचारों के लिंक भी संलग्न किए गए थे। वहीं 16 जनवरी 2025 को जारी तीसरे पत्र में दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के संदर्भ में पुनः जांच कर आवश्यक विधि-सम्मत कार्रवाई करते हुए अनुपालन प्रतिवेदन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि विभाग ने मीडिया में प्रकाशित समाचारों तथा शुभंकर कुमार के आवेदनों को औपचारिक रूप से संज्ञान में लिया था। सेवा नियमों के अनुसार किसी भी सरकारी कर्मचारी को न्यायालय में व्यक्तिगत वाद की पैरवी, अवकाश लेने अथवा सेवा संबंधी विषयों पर सार्वजनिक बयान देने के लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लेना आवश्यक होता है। उपलब्ध दस्तावेजों से यह प्रतीत होता है कि शुभंकर कुमार ने इन प्रक्रियाओं का पालन करते हुए बार-बार आवेदन प्रस्तुत किए। हालांकि शुभंकर कुमार द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि किसी न्यायालय अथवा सक्षम विभागीय प्राधिकारी द्वारा अंतिम रूप से नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन आरोपों की सत्यता पर अंतिम निर्णय न्यायिक एवं विभागीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल यह मामला इस सवाल को लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है कि यदि किसी पुलिसकर्मी को अपने वैधानिक अधिकारों के लिए वर्षों तक लगातार आवेदन देने पड़ें और उसके बाद भी विवाद का अंतिम समाधान न हो तो इससे विभागीय व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया की गति पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़े होते हैं।

इन्हें भी पढ़ें.