रहस्यमयी फरसे के दर्शन को टांगीनाथ धाम पहुंचे भक्त, श्रद्धा से मनाई परशुराम जयंती
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सीता स्वयंवर में भगवान राम द्वारा शिव धनुष टूटने के बाद भगवान परशुराम क्रोधित हुए थे।

डुमरी से भीम प्रसाद की रिपोर्ट
डुमरी (गुमला ): डुमरी प्रखंड स्थित प्रसिद्ध बाबा टांगीनाथ धाम में भगवान परशुराम जयंती श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाई गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर पहुंचे और भगवान परशुराम की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की। पूरे मंदिर परिसर में दिनभर भक्तों की भीड़ लगी रही।
सुबह से ही श्रद्धालु फूल-माला, नारियल और प्रसाद लेकर मंदिर पहुंचे। भक्तों ने भगवान परशुराम से परिवार की खुशहाली, शांति और समृद्धि की प्रार्थना की। मंदिर परिसर जयकारों से गूंज उठा। टांगीनाथ धाम का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व काफी प्राचीन माना जाता है। यहां स्थापित विशाल त्रिशूलनुमा फरसा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यह भगवान परशुराम का दिव्य शस्त्र है, जिसे उन्होंने यहां स्थापित किया था।
इस फरसे की कई रहस्यमयी विशेषताएं आज भी लोगों को आश्चर्यचकित करती हैं। कहा जाता है कि यह हजारों वर्षों से खुले आसमान के नीचे धूप, बारिश और मौसम की मार झेलने के बावजूद आज तक जंग-मुक्त है। यह बात वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए भी कौतूहल का विषय बनी हुई है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, 1980 के दशक में इसकी गहराई जानने के लिए खुदाई कराई गई थी, लेकिन करीब 15 फीट तक खुदाई के बाद भी इसका अंतिम छोर नहीं मिल सका। इसके बाद खुदाई कार्य रोक दिया गया। यह फरसा आज भी मंदिर के सामने खुले स्थान पर जमीन में गड़ा हुआ है। हाल के वर्षों में इस फरसे का एक खंडित अग्र भाग, जो करीब सौ वर्ष पूर्व गायब हो गया था, छत्तीसगढ़ के एक गांव से वापस लाकर मंदिर परिसर में पुनर्स्थापित किया गया। इससे श्रद्धालुओं में खुशी देखी गई।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सीता स्वयंवर में भगवान राम द्वारा शिव धनुष टूटने के बाद भगवान परशुराम क्रोधित हुए थे। बाद में जब उन्हें ज्ञात हुआ कि श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं, तब वे पश्चाताप करने इस स्थान पर आए और अपना फरसा गाड़कर तपस्या में लीन हो गए। एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान शिव ने शनि देव पर क्रोधित होकर त्रिशूल से प्रहार किया था। शनि देव तो बच गए, लेकिन त्रिशूल इसी पहाड़ी पर आकर धंस गया, जिसे आज टांगीनाथ धाम के रूप में पूजा जाता है। स्थानीय लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि प्राचीन काल में कुछ लोगों ने इस त्रिशूल को काटने या चोरी करने का प्रयास किया था, जिसके बाद उन्हें श्राप मिला। इसी कारण आज भी आसपास के क्षेत्र में कई लोग इस स्थान को अत्यंत पवित्र मानते हैं। भगवान परशुराम जयंती के अवसर पर श्रद्धालुओं ने मंदिर में पूजा-अर्चना कर क्षेत्र की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की। टांगीनाथ धाम आज भी आस्था, इतिहास और रहस्य का अद्भुत संगम बना हुआ है।