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क्या एक पुलिसकर्मी को भी न्याय के लिए लड़नी पड़ती है ऐसी लड़ाई? एएसआई शुभंकर कुमार का मामला फिर चर्चा में

रिपोर्ट: MANISH 12 घंटे पहलेझारखण्ड

23 मार्च 2022 से 30 जून 2026 तक आवेदन ही आवेदन, 9 जुलाई को मीडिया से बात करने की अनुमति भी मांगी, पुलिसकर्मी के न्यायिक अधिकारों पर उठे सवाल

क्या एक पुलिसकर्मी को भी न्याय के लिए लड़नी पड़ती है ऐसी लड़ाई? एएसआई शुभंकर कुमार का मामला फिर चर्चा में

सरायकेला-खरसावां : जिले में पदस्थापित एएसआई शुभंकर कुमार का मामला एक बार फिर चर्चा में है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उन्होंने वर्ष 2022 से लेकर वर्ष 2026 तक अपने विभागीय प्रकरण में न्यायिक राहत पाने के लिए लगातार वरीय अधिकारियों को आवेदन दिए। उनका कहना है कि उन्हें न्यायालय में अपने पक्ष को रखने और अपनी बात सार्वजनिक करने के लिए भी बार-बार विभागीय अनुमति मांगनी पड़ रही है। 23 मार्च 2022 को पुलिस अधीक्षक, सरायकेला-खरसावां तथा तत्कालीन डीआईजी, सिंहभूम (कोल्हान) क्षेत्र को दिए गए दो अलग-अलग आवेदनों में शुभंकर कुमार ने तत्कालीन डीआईजी कुलदीप द्विवेदी, राजीव रंजन और असीम विक्रांत मिंज सहित कई तत्कालीन पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध हाईकोर्ट, रांची में मुकदमा दायर करने के लिए आवश्यक अवकाश एवं अनुमति का अनुरोध किया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उनके द्वारा विभागीय आदेश के विरुद्ध पूर्व में कई अपीलें दायर की गई थीं लेकिन उनका समय पर निष्पादन नहीं हुआ। आवेदन में शुभंकर कुमार ने लिखा कि सरायकेला-खरसावां से संबंधित मामला अवकाश से जुड़ा है जबकि पाकुड़ का मामला पुलिस बल के सदस्यों के कल्याणकारी कार्यों से संबंधित था। उन्होंने अदालत में मुकदमा दायर करने के लिए आकस्मिक अवकाश (CL) एवं अर्जित अवकाश (PL) स्वीकृत करने का अनुरोध किया ताकि वे न्यायालयी कार्यवाही पूरी कर सकें। दस्तावेजों के अनुसार इसके बाद भी मामला आगे बढ़ा और 30 जून 2026 को उन्होंने पुनः हाईकोर्ट, रांची में जाने के लिए अवकाश का आवेदन दिया। इसके बाद 9 जुलाई 2026 को उन्होंने मीडिया के समक्ष अपना पक्ष रखने के लिए विभाग से अनुमति भी मांगी। इससे यह स्पष्ट होता है कि लगभग चार वर्षों के दौरान वे लगातार विभागीय प्रक्रिया का पालन करते हुए लिखित अनुमति लेते रहे। शुभंकर कुमार का पक्ष है कि उन्होंने किसी भी स्तर पर नियमों की अनदेखी नहीं की बल्कि प्रत्येक कदम पर सक्षम अधिकारियों को आवेदन देकर अनुमति और अवकाश का अनुरोध किया। उनका कहना है कि न्यायालय में जाने तथा अपनी बात रखने का अधिकार प्रत्येक कर्मचारी को संवैधानिक रूप से प्राप्त है और उन्होंने उसी अधिकार का प्रयोग करने का प्रयास किया। सेवा नियमों के अनुसार सरकारी कर्मी यदि न्यायालयी कार्यवाही, व्यक्तिगत वाद अथवा अन्य वैधानिक कारणों से अवकाश चाहते हैं तो उन्हें सक्षम प्राधिकारी से स्वीकृति प्राप्त करनी होती है। इसी प्रकार सेवा से संबंधित मामलों में सार्वजनिक बयान या मीडिया से संवाद के लिए भी विभागीय नियमों का पालन अपेक्षित होता है। उपलब्ध दस्तावेजों से यह प्रतीत होता है कि शुभंकर कुमार ने इन प्रक्रियाओं का पालन करते हुए आवेदन प्रस्तुत किए। हालांकि इन आवेदनों में लगाए गए आरोप या दावे न्यायालय अथवा किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा सिद्ध नहीं हुए हैं। संबंधित अधिकारियों का पक्ष सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। ऐसे में मामले का अंतिम सत्य न्यायिक एवं विभागीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल यह प्रकरण इस बात को लेकर चर्चा में है कि एक पुलिसकर्मी द्वारा न्यायिक राहत प्राप्त करने के लिए वर्षों तक लगातार आवेदन दिए जाने के बावजूद विवाद का समाधान अब तक नहीं हो सका।

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