बिना ठोस साक्ष्य पुलिस पर आरोप लगाना कितना उचित? कपाली ओपी प्रकरण पर उठे सवाल
तथ्यों से पहले फैसला क्यों? सनसनीखेज आरोपों वाली खबर पर निष्पक्ष जांच की मांग तेज

सरायकेला-खरसावां : कपाली ओपी से जुड़े मामले को लेकर स्थानीय पत्रकार द्वारा व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर किए गए एक समाचार के बाद पत्रकारिता की निष्पक्षता और तथ्यों की पुष्टि को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि संबंधित खबर में कपाली ओपी प्रभारी पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं जबकि अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसे आरोपों की पुष्टि करने वाला कोई आधिकारिक दस्तावेज, जांच रिपोर्ट या न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। कानूनी जानकारों का कहना है कि किसी भी पुलिस पदाधिकारी या सरकारी अधिकारी पर गंभीर आरोप लगाने से पहले ठोस साक्ष्य, प्रत्यक्ष गवाह और आधिकारिक जांच का आधार होना आवश्यक है। केवल आरोपों या एकतरफा बयानों के आधार पर किसी व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुंचाना पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जाता। स्थानीय लोगों का भी कहना है कि यदि किसी घटना में पुलिसकर्मियों की भूमिका संदिग्ध है तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए लेकिन जांच पूरी होने से पहले किसी अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं है। उनका मानना है कि मीडिया की जिम्मेदारी तथ्यों को सामने लाने की है न कि किसी निष्कर्ष को पहले से स्थापित करने की। जानकारों के अनुसार प्रेस परिषद के मानदंड और पत्रकारिता की आचार संहिता भी यह स्पष्ट करती है कि किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोपों के संबंध में उसका पक्ष लेना और तथ्यों का सत्यापन करना आवश्यक है। ऐसे मामलों में संतुलित रिपोर्टिंग ही जनविश्वास बनाए रख सकती है। फिलहाल पूरे मामले में संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया और किसी आधिकारिक जांच रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो तथा तथ्य सामने आने के बाद ही किसी प्रकार का निष्कर्ष निकाला जाए ताकि सत्य भी सामने आए और किसी निर्दोष की प्रतिष्ठा भी प्रभावित न हो।