पुरी की रथ यात्रा का अद्भुत रहस्य, हर साल नए बनते हैं भगवान के रथ, फिर भी जीवित रहती है सदियों पुरानी परंपरा
जमशेदपुर से जादूगोड़ा तक रथयात्रा की तैयारियां तेज, पुरी की अनूठी परंपरा आस्था और संस्कृति का बन रही केंद्रबिंदु

रिपोर्ट : सौरभ कुमार, जादूगोड़ा
आषाढ़ मास के आगमन के साथ ही पूरे पूर्वी भारत में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को लेकर भक्तों में उत्साह बढ़ने लगा है। ओडिशा के पुरी में होने वाली विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा की गूंज इस बार भी झारखंड के जमशेदपुर, सरायकेला, खरसावां, चांडिल, आदित्यपुर, टेल्को, बिष्टुपुर, जुगसलाई, जादूगोड़ा, घाटशिला, मुसाबनी और आसपास के क्षेत्रों में सुनाई देने लगी है। विभिन्न धार्मिक समितियां और मंदिर प्रबंधन रथयात्रा की तैयारियों में जुट गए हैं। पुरी की रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति, शिल्पकला और सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक है। भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को अपने भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। इस यात्रा में लाखों श्रद्धालु शामिल होकर रथ खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। पुरी रथयात्रा की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि हर वर्ष तीनों रथ नए सिरे से तैयार किए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष, बलभद्र का तालध्वज और सुभद्रा का दर्पदलन रथ पारंपरिक विधि से विशेष लकड़ियों से निर्मित किए जाते हैं। सैकड़ों कारीगर लगभग दो महीने तक दिन-रात मेहनत कर इन रथों को आकार देते हैं। आधुनिक तकनीक के इस दौर में भी सदियों पुरानी निर्माण पद्धति का पालन किया जाता है। रथयात्रा समाप्त होने के बाद इन रथों को श्रद्धापूर्वक विघटित किया जाता है। रथों की लकड़ियों का उपयोग श्रीजगन्नाथ मंदिर की विश्वप्रसिद्ध रसोई में महाप्रसाद तैयार करने के लिए किया जाता है। मान्यता है कि इन लकड़ियों से प्रज्ज्वलित अग्नि अत्यंत पवित्र होती है। वहीं रथों के कुछ धार्मिक प्रतीकों और विशेष हिस्सों को संरक्षित कर अगले वर्ष के रथों में पुनः उपयोग किया जाता है। इधर जमशेदपुर और आसपास के क्षेत्रों में भी रथयात्रा को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। शहर के विभिन्न जगन्नाथ मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और रथ सज्जा का कार्य शुरू हो चुका है। श्रद्धालुओं का मानना है कि पुरी की रथयात्रा केवल ओडिशा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे पूर्वी भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान बन चुकी है। धार्मिक जानकारों के अनुसार रथयात्रा हमें यह संदेश देती है कि भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। यही कारण है कि हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु इस दिव्य परंपरा से जुड़ते हैं। पुरी की रथयात्रा आज भी यह साबित करती है कि भारत की सनातन परंपराएं केवल आस्था नहीं बल्कि प्रकृति, संस्कृति, श्रम और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम हैं। जमशेदपुर और कोल्हान क्षेत्र में होने वाली रथयात्राएं भी इसी महान परंपरा की जीवंत कड़ी बनकर लोगों को भगवान जगन्नाथ की भक्ति से जोड़ रही हैं।