सरायकेला में शिक्षा व्यवस्था की खुली पोल, जर्जर स्कूल में हादसा, 12 साल से अधूरा आंगनबाड़ी और परीक्षा से वंचित 11 बच्चों का भविष्य दांव पर
योजनाओं और बैठकों के बावजूद जमीनी सच्चाई कड़वी - लापरवाही, भ्रष्टाचार और उदासीनता से शिक्षा तंत्र चरमराया

सरायकेला-खरसावां : जिले में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर लगातार बैठकें और योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन जमीनी स्तर पर हालात बेहद चिंताजनक बने हुए हैं। बीते कुछ दिनों में सामने आए तीन अलग-अलग मामलों ने यह साबित कर दिया है कि शिक्षा तंत्र में गहरी खामियां हैं और जिम्मेदारों की लापरवाही बच्चों की सुरक्षा और भविष्य दोनों के लिए खतरा बन चुकी है।
जर्जर स्कूल में हादसा, बाल-बाल बचे बच्चे
पहला मामला सरायकेला प्रखंड के खापरसाई स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय का है जहां मंगलवार को एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया। जर्जर स्कूल भवन का बाहरी छज्जा अचानक भरभराकर गिर पड़ा। उस समय स्कूल में 28 बच्चे मौजूद थे लेकिन संयोगवश मध्यान्ह भोजन की घंटी बजते ही अधिकांश बच्चे बाहर निकल गए थे जिससे बड़ी दुर्घटना टल गई। फिर भी इस हादसे में 11 वर्षीय मुस्कान बारला, 9 वर्षीय रेशमी बारला और 7 वर्षीय सोनाली जामुदा घायल हो गईं। प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें घर भेज दिया गया लेकिन इस घटना ने बच्चों और अभिभावकों के मन में भय पैदा कर दिया है। बच्चे अब स्कूल भवन के अंदर जाने से डर रहे हैं और खुले में पेड़ के नीचे पढ़ाई करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों के अनुसार यह भवन 1985 में बना था और पिछले कई वर्षों से जर्जर स्थिति में है। बरसात में छत टपकती है, दीवारों से प्लास्टर गिरता रहता है और कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि विद्यालय की प्रभारी प्रधानाध्यापिका ने पहले ही विभाग को लिखित रूप से चेतावनी दी थी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। हादसे के 24 घंटे बाद तक भी कोई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा जिससे ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
12 वर्षों से पेड़ के नीचे पढ़ाई, अधूरा आंगनबाड़ी भवन
दूसरा मामला कुकड़ु प्रखंड के सपादा गांव का है जहां छोटे-छोटे बच्चे पिछले 12 वर्षों से आंगनबाड़ी केंद्र के अभाव में खुले आसमान के नीचे पढ़ने को मजबूर हैं। चार वर्ष पहले भवन निर्माण की स्वीकृति मिलने के बाद काम शुरू तो हुआ लेकिन आज तक अधूरा पड़ा है। बच्चे कभी कटहल तो कभी काजू के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करते हैं। यहां न तो पीने के पानी की समुचित व्यवस्था है और न ही शौचालय की सुविधा। मध्यान्ह भोजन एक जर्जर भवन में बनाया जाता है जो खुद किसी हादसे को न्योता देता है। अभिभावकों का कहना है कि बच्चा चोरी की अफवाहों और सड़क से गुजरते वाहनों के कारण वे अपने बच्चों को भेजने में भी डरते हैं। बारिश या खराब मौसम में बच्चों को जर्जर भवन में शरण लेनी पड़ती है जिससे उनकी सुरक्षा हमेशा खतरे में रहती है। यह स्थिति केवल लापरवाही ही नहीं बल्कि बच्चों के अधिकारों के साथ सीधा खिलवाड़ है।
11 बच्चे परीक्षा से वंचित, भविष्य अधर में
तीसरा और सबसे गंभीर मामला नीमडीह प्रखंड के दलमा तराई क्षेत्र स्थित टेंगाडीह गांव का है जहां 8वीं बोर्ड परीक्षा में एक भी छात्र शामिल नहीं हो सका। कुल 11 छात्र-छात्राएं सिर्फ इसलिए परीक्षा से वंचित रह गए क्योंकि उनका एडमिट कार्ड समय पर नहीं बनाया गया। इन छात्रों में चित्रा सिंह, उत्तम सिंह, प्रतिमा सिंह, उर्मिला दास, जीतवाहन सिंह, चंपारानी सिंह, प्रियंका मुर्मू, वनबिहारी सिंह, सुशील हांसदा, शुभम मांझी और मनोज सिंह शामिल हैं। अभिभावकों का कहना है कि यह सीधे-सीधे विद्यालय प्रबंधन, प्रधानाध्यापक और शिक्षकों की लापरवाही का परिणाम है। एक अभिभावक ने भावुक होकर कहा कि हम गरीब लोग मेहनत कर बच्चों को पढ़ाते हैं लेकिन उनकी एक साल की मेहनत यूं ही बर्बाद हो गई। इसका जिम्मेदार कौन है? विद्यालय की स्थिति भी बेहद खराब है। 15 कमरों वाले स्कूल में तीन शिक्षक पदस्थापित हैं लेकिन पढ़ाई एक ही कमरे में होती है। बच्चों के लिए न डेस्क-बेंच है, न ड्रेस और न ही शौचालय की सही व्यवस्था। पानी के लिए चापाकल का सहारा लेना पड़ता है और मिड-डे मील लकड़ी के चूल्हे पर बनता है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि कुछ शिक्षक समय पर स्कूल नहीं आते और कभी-कभी नशे की हालत में भी आते हैं। इसके बावजूद उन्हें नियमित वेतन मिल रहा है जो सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जवाबदेही पर सवाल, निगरानी तंत्र फेल
इन तीनों मामलों ने शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था की पोल खोल दी है। सवाल उठता है कि जब बायोमेट्रिक अटेंडेंस लागू है तो लापरवाह शिक्षक कैसे नियमित वेतन पा रहे हैं? स्कूल प्रबंधन समितियां क्या कर रही हैं? और प्रखंड स्तर के अधिकारी इस स्थिति से अनजान कैसे हैं? एसएमसी अध्यक्ष तक को विद्यालय की स्थिति की जानकारी नहीं होना इस बात का प्रमाण है कि निगरानी पूरी तरह फेल हो चुकी है।
प्रशासन हरकत में, कार्रवाई का भरोसा
जिला शिक्षा अधीक्षक कैलाश मिश्रा ने इन मामलों को गंभीरता से लेते हुए कहा है कि बच्चों का भविष्य बर्बाद नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को जांच के निर्देश दिए हैं और आश्वासन दिया है कि 11 बच्चों के लिए विशेष परीक्षा आयोजित की जाएगी। साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि किसी शिक्षक के नशे में होने की पुष्टि होती है तो उसे तत्काल बर्खास्त किया जाएगा। बीईईओ को भी मौके पर जाकर निरीक्षण करने का निर्देश दिया गया है।
बड़ा सवाल - क्या बदलेगी व्यवस्था?
सरायकेला-खरसावां में एक तरफ प्रशासन शिक्षा सुधार के लिए बैठकें कर रहा है वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जो पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती हैं। बच्चों की जान जोखिम में डालकर पढ़ाई, खुले आसमान के नीचे शिक्षा और परीक्षा से वंचित छात्र.. ये सब संकेत हैं कि समस्या सिर्फ संसाधनों की नहीं बल्कि जिम्मेदारी और जवाबदेही की भी है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इन मामलों में कितनी तेजी और सख्ती से कार्रवाई करता है। क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी? क्या अधूरे भवन पूरे होंगे? और क्या बच्चों को सुरक्षित व बेहतर शिक्षा मिल पाएगी? फिलहाल जिले के हजारों अभिभावकों और बच्चों की नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।