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प्रधानमंत्री ने जिस जिले की सहिया की बहादुरी को सराहा था, उसी जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था ने छीनी एक सहिया और उसके नवजात की जिंदगी, जांच तेज

रिपोर्ट: MANISH 8 घंटे पहलेझारखण्ड

एसडीओ की प्रारंभिक जांच में लापरवाही उजागर, सोलर पैनल और जेनरेटर व्यवस्था होने के बावजूद मोबाइल की रोशनी में कराया गया प्रसव

प्रधानमंत्री ने जिस जिले की सहिया की बहादुरी को सराहा था, उसी जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था ने छीनी एक सहिया और उसके नवजात की जिंदगी, जांच तेज

सरायकेला-खरसावां : जिले के राजनगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में जच्चा-बच्चा की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत उजागर कर दी है। इस दर्दनाक घटना का सबसे पीड़ादायक पहलू यह है कि मृतका बिनीता बानरा खुद एक स्वास्थ्य सहिया थीं, वही सहिया जो गांव-गांव जाकर मातृ-शिशु स्वास्थ्य की रक्षा के लिए लोगों को जागरूक करती थीं। परिजनों के अनुसार प्रसव के दौरान अचानक बिजली आपूर्ति ठप हो गई और हालात इतने बिगड़ गए कि मोबाइल की टॉर्च की रोशनी में डिलीवरी कराने की कोशिश की गई। अस्पताल में सोलर सिस्टम और जनरेटर (डीजी) उपलब्ध होने के बावजूद उनका उपयोग नहीं किया गया। समय पर इलाज और रेफरल की सुविधा नहीं मिलने से बिनीता और उनके नवजात बेटे की मौत हो गई। यह घटना इसलिए भी झकझोरने वाली है क्योंकि इसी जिले की एक सहिया ने 11 सितंबर 2018 को अपनी सूझबूझ से एक नवजात की जान बचाकर पूरे देश में मिसाल पेश की थी। उस साहसिक कार्य की सराहना स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। उस घटना ने यह साबित किया था कि सीमित संसाधनों में भी सहिया कार्यकर्ता जीवन बचाने की क्षमता रखती हैं। लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल उलट दिख रही है। जहां एक सहिया जो दूसरों की जिंदगी बचाने का काम करती थी वही सिस्टम की लापरवाही के कारण अपनी जान गंवा बैठी। घटना के बाद आक्रोशित परिजनों और ग्रामीणों ने अस्पताल में हंगामा किया और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है। उपायुक्त के निर्देश पर अनुमंडल पदाधिकारी अभिनव प्रकाश के नेतृत्व में जांच टीम ने अस्पताल पहुंचकर नर्सों, कर्मियों और जनरेटर ऑपरेटर से पूछताछ की। प्रारंभिक जांच में यह सामने आया कि वैकल्पिक व्यवस्था होने के बावजूद जनरेटर नहीं चलाया गया। एसडीओ ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ती है कि क्या सहियाओं के भरोसे चलने वाली ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था अब खुद ही असुरक्षित हो चुकी है? अब सबकी नजर प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी है।

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