शिक्षा, प्रशासन और राजनीति के बीच संतुलन का सवाल.. क्या अब बदलाव की जरूरत है? शिक्षकों को पढ़ाने, अधिकारियों को प्रशासन चलाने और युवाओं को अवसर देने पर हो गंभीर विमर्श
बेरोजगारी और व्यवस्था सुधार का नया मॉडल बन सकता है समाधान, लोकतंत्र को मिलेगी नई मजबूती

रिपोर्ट : सौरभ कुमार, जादूगोड़ा
भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में शिक्षा, प्रशासन और राजनीति तीन ऐसे स्तंभ हैं जिन पर राष्ट्र की प्रगति और भविष्य टिका होता है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी अलग भूमिका, जिम्मेदारी और विशेषज्ञता है। शिक्षक का कार्य विद्यार्थियों का भविष्य गढ़ना है, प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व शासन व्यवस्था को प्रभावी ढंग से संचालित करना है जबकि जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप नीतियां बनाना और विकास की दिशा तय करना है। लेकिन समय-समय पर यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या हमारी व्यवस्था इन तीनों वर्गों की विशेषज्ञता का सही उपयोग कर पा रही है? सरकारी शिक्षक बनने के लिए युवाओं को वर्षों तक अध्ययन करना पड़ता है। स्नातक, बी.एड., शिक्षक पात्रता परीक्षा और कठिन चयन प्रक्रिया से गुजरने के बाद उन्हें विद्यालयों में नियुक्ति मिलती है। इसी प्रकार आईएएस, आईपीएस और अन्य प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारी भी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं, साक्षात्कारों और लंबे प्रशिक्षण के बाद प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालते हैं। स्वाभाविक रूप से समाज उनसे उनके मूल कार्यक्षेत्र में सर्वोत्तम योगदान की अपेक्षा करता है। हालांकि व्यवहारिक स्थिति कुछ अलग दिखाई देती है। चुनाव, जनगणना, मतदाता सूची पुनरीक्षण, विभिन्न सर्वेक्षणों और अन्य सरकारी अभियानों में बड़ी संख्या में शिक्षकों की ड्यूटी लगा दी जाती है। परिणामस्वरूप कई विद्यालयों में पढ़ाई प्रभावित होती है। अभिभावक और शिक्षा विशेषज्ञ वर्षों से यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि शिक्षक लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में व्यस्त रहेंगे तो बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर प्रशासनिक अधिकारियों को भी कई बार अपने मूल प्रशासनिक दायित्वों के अतिरिक्त राजनीतिक और प्रक्रियागत दबावों के बीच काम करना पड़ता है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की भूमिका सर्वोपरि है लेकिन यह भी आवश्यक है कि प्रशासनिक तंत्र को पेशेवर दक्षता और पारदर्शिता के साथ कार्य करने का पर्याप्त अवसर मिले। स्थानांतरण, पदस्थापन और निर्णय प्रक्रिया को लेकर समय-समय पर उठने वाली बहसें इसी चिंता को दर्शाती हैं। ऐसे में एक महत्वपूर्ण सुझाव सामने आता है। चुनाव, जनगणना, सर्वेक्षण, मतदान और मतगणना जैसे अस्थायी कार्यों के लिए स्थानीय शिक्षित बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षित कर नियोजित किया जा सकता है। इससे शिक्षकों को अपने मूल कार्य पर ध्यान देने का अवसर मिलेगा और प्रशासन को भी अतिरिक्त प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध होगा। इस व्यवस्था के कई लाभ हो सकते हैं। शिक्षकों की कक्षाएं बाधित नहीं होंगी, युवाओं को रोजगार और अनुभव मिलेगा, सरकारी कार्यों में जनभागीदारी बढ़ेगी तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं को नए मानव संसाधन का सहयोग प्राप्त होगा। साथ ही युवाओं में शासन-प्रशासन के प्रति समझ और जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होगी। लोकतंत्र में किसी वर्ग को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता केवल बेहतर समन्वय और संतुलित व्यवस्था की है। यदि शिक्षक शिक्षा पर, अधिकारी प्रशासन पर और जनप्रतिनिधि नीति निर्माण पर पूरी क्षमता से कार्य कर सकें तो देश की संस्थाएं और अधिक प्रभावी बन सकती हैं। आज जब देश बेरोजगारी, शिक्षा की गुणवत्ता और प्रशासनिक दक्षता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से जूझ रहा है तब इस प्रकार के वैकल्पिक मॉडल पर गंभीर चर्चा समय की मांग बन गई है। यदि नीति-निर्माता इस दिशा में ठोस पहल करें तो यह न केवल शिक्षा व्यवस्था को सशक्त करेगा बल्कि लाखों शिक्षित युवाओं के लिए अवसरों के नए द्वार भी खोलेगा। यही एक मजबूत, जवाबदेह और दूरदर्शी लोकतंत्र की पहचान हो सकती है।