झारखंड के जंगलों का मीठा खजाना (केंदू) संकट में, तेजी से घट रही पेड़ों की संख्या
क्या आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी केंदू का स्वाद? संरक्षण नहीं हुआ तो मिट जाएगी जंगलों की पहचान

रिपोर्ट : सौरभ कुमार, जादूगोड़ा
झारखंड की पहचान केवल उसके घने जंगल, पहाड़ और खनिज संपदा ही नहीं हैं बल्कि यहां की जैव विविधता और पारंपरिक वन संपदा भी इसकी सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन्हीं प्राकृतिक धरोहरों में शामिल है केंड (केंदू) का फल जो कभी जंगलों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता था और ग्रामीणों तथा आदिवासी समुदाय के जीवन का अभिन्न अंग हुआ करता था। लेकिन आज यह बहुमूल्य वृक्ष धीरे-धीरे जंगलों से गायब होता जा रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाली पीढ़ियां शायद केवल किताबों, तस्वीरों और बुजुर्गों की कहानियों में ही केंड को देख और जान पाएंगी। गर्मियों का मौसम आते ही आम, जामुन और लीची की चर्चा शुरू हो जाती है लेकिन जंगलों के बीच पनपने वाला केंड फल अपनी अलग पहचान रखता है। पकने के बाद इसका स्वाद अत्यंत मीठा और आकर्षक होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे और बड़े इसे बड़े चाव से खाते हैं। इसका स्वाद न केवल प्राकृतिक मिठास से भरपूर होता है बल्कि यह जंगल और ग्रामीण जीवन की स्मृतियों से भी जुड़ा हुआ है। केंड का पेड़ प्राकृतिक रूप से जंगलों में उगता है। इसकी लकड़ी मजबूत होती है और ग्रामीण क्षेत्रों में इसका उपयोग ईंधन के रूप में भी किया जाता है। विशेष बात यह है कि जब इसकी लकड़ी जलती है तो उसमें से नीले रंग की चमकदार लपटें निकलती हैं और चटकने की विशेष आवाज आती है। यही वजह है कि कई गांवों में मकर संक्रांति के आसपास बच्चे मनोरंजन के लिए केंड के पेड़ों की टहनियां या छोटे पेड़ काटकर जलाते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा अब इस वृक्ष के अस्तित्व के लिए खतरा बनती जा रही है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब जंगलों में केंड के पेड़ बड़ी संख्या में दिखाई देते थे। गांवों के आसपास, पहाड़ी क्षेत्रों और जंगलों में यह आसानी से मिल जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या तेजी से घटी है। जंगलों की कटाई, अंधाधुंध दोहन, ईंधन के लिए पेड़ों का उपयोग और संरक्षण की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि केंड का प्राकृतिक पुनर्जनन आसान नहीं है। विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों के अनुसार, इसके बीजों से नए पौधे बहुत कम उगते हैं। यही कारण है कि एक बार पेड़ नष्ट हो जाने पर उसकी भरपाई प्राकृतिक रूप से नहीं हो पाती। इससे जंगलों में इसकी संख्या लगातार कम होती जा रही है। यदि समय रहते संरक्षण के उपाय नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में यह वृक्ष दुर्लभ श्रेणी में पहुंच सकता है। हालांकि जंगलों में इसकी संख्या घट रही है फिर भी लोगों के बीच इसकी लोकप्रियता बरकरार है। जादूगोड़ा कॉलोनी क्षेत्र के साप्ताहिक हाट में महिलाएं और बच्चे केंड फल बेचते हुए दिखाई देते हैं। वहीं जमशेदपुर से जादूगोड़ा जाने वाले मार्ग पर झरिया क्षेत्र के आसपास सड़क किनारे भी ग्रामीण इसे बेचते नजर आते हैं। राहगीर रुककर इस देसी फल का स्वाद लेते हैं और अपने बचपन की यादों को ताजा करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि लोगों के दिलों में आज भी इस फल के लिए विशेष स्थान है। पर्यावरणविदों का मानना है कि केवल सरकारी योजनाएं ही इस वृक्ष को नहीं बचा सकतीं। इसके लिए जनभागीदारी और जागरूकता भी जरूरी है। यदि स्कूल स्तर से बच्चों को स्थानीय वन संपदा, देसी फलदार वृक्षों और पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा दी जाए तो उनमें प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित होगी। जंगलमहल क्षेत्र के प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में केंड जैसे वृक्षों के महत्व को पाठ्य सामग्री और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से शामिल किया जा सकता है। इसके अलावा वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संगठनों को मिलकर केंड वृक्षों के संरक्षण एवं वृक्षारोपण अभियान चलाने की आवश्यकता है। गांव स्तर पर लोगों को यह समझाना होगा कि पेड़ों को काटने के बजाय उन्हें संरक्षित करना उनके भविष्य के लिए कितना महत्वपूर्ण है। यदि प्रत्येक गांव में केंड के पौधे लगाने और उन्हें संरक्षित करने का अभियान शुरू हो तो इसकी संख्या फिर से बढ़ाई जा सकती है। केंड केवल एक फलदार वृक्ष नहीं है बल्कि यह झारखंड की आदिवासी संस्कृति, ग्रामीण जीवन और जंगलों की पहचान का प्रतीक है। इसके साथ लोगों की भावनाएं, स्मृतियां और पारंपरिक जीवनशैली जुड़ी हुई हैं। यह प्रकृति और मनुष्य के बीच उस संबंध का प्रतीक है जो सदियों से बना हुआ है। आज विश्व पर्यावरण संरक्षण की बात करता है जैव विविधता बचाने की बात करता है। ऐसे समय में केंड जैसे स्थानीय और पारंपरिक वृक्षों का संरक्षण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि हम अपनी इस प्राकृतिक धरोहर को नहीं बचा पाए तो केवल एक वृक्ष या फल ही नहीं खोएंगे बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी खो देंगे। केंड को बचाना दरअसल जंगलों को बचाना है, प्रकृति को बचाना है और आने वाली पीढ़ियों के लिए उस विरासत को सुरक्षित रखना है जो हमें अपने पूर्वजों से मिली है। अब यह जिम्मेदारी समाज, प्रशासन और प्रत्येक नागरिक की है कि वह इस मीठे जंगली खजाने को विलुप्त होने से बचाने के लिए आगे आए। तभी आने वाली पीढ़ियां भी केंड के उस अनोखे स्वाद और उसकी सांस्कृतिक महत्ता को महसूस कर सकेंगी।