इलाहाबाद हाई कोर्ट का विवादास्पद फैसला : महिलाओं की सुरक्षा पर उठे सवाल
इस फैसले से समाज में एक नई बहस छिड़ गई है

मेदिनीनगर : न्यायालय पर सवाल उठाना संवैधानिक रूप से अनुचित माना जाता है, लेकिन जब न्यायिक निर्णय अटपटे और असंगत लगें, तो प्रश्न उठाना आवश्यक हो जाता है। हम यहां इलाहाबाद हाई कोर्ट के हालिया फैसले की बात कर रहे हैं, जो सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर व्यापक रूप से चर्चा का विषय बना हुआ है। यह निर्णय एक 11 वर्षीय बच्ची से जुड़े गंभीर मामले से संबंधित है। बच्ची के साथ तीन युवकों द्वारा दुष्कर्म का प्रयास किया गया था। इस मामले में, इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण की पीठ ने यह टिप्पणी की कि पीड़िता के स्तनों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचकर ले जाना बलात्कार या बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता। इस फैसले के चलते आरोपियों पर लगाए गए धाराओं को हल्का कर दिया गया, जिससे व्यापक असंतोष फैल गया। इस निर्णय के खिलाफ महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और महिला नेताओं ने नाराजगी जाहिर की है। लोहरदगा मनरेगा की लोकपाल इंदु तिवारी ने इस फैसले को बेहद निराशाजनक और स्तब्ध करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि यह न्याय प्रणाली की महिलाओं की सुरक्षा के प्रति उदासीनता को दर्शाता है और अपराधियों को प्रोत्साहित करने वाला संदेश देता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी महिला के निजी अंगों को जबरन छूना और कपड़े फाड़ने का प्रयास गंभीर यौन अपराध की श्रेणी में आता है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि बिना सहमति के किसी भी प्रकार का यौन स्पर्श यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आता है। अतः इस फैसले की पुनः समीक्षा की जानी चाहिए और महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। मिशन समृद्धि की अध्यक्ष शीला श्रीवास्तव ने इस निर्णय की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि यह फैसला न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता। उन्होंने प्रश्न उठाया कि महिला के निजी अंगों को पकड़ना और उसके कपड़े उतारने का प्रयास यदि दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता, तो फिर इसे क्या कहा जाएगा? यदि न्यायालय से इस प्रकार के निर्णय आने लगे तो यह महिला समुदाय का अपमान होगा। सामाजिक कार्यकर्ता वैजयंती गुप्ता ने कहा कि ऐसे फैसले समाज में महिलाओं की सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं। यदि इस तरह की घटनाओं को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो कोई भी बहन-बेटी सुरक्षित नहीं रहेगी। न्यायपालिका से निष्पक्ष और कठोर निर्णय की अपेक्षा की जाती है, ताकि समाज में महिलाओं की गरिमा बनी रहे। रंजीता ने कहा कि यह फैसला महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा को नजरअंदाज करता है। इस प्रकार के निर्णय से अपराधियों का हौसला बढ़ेगा और समाज में गलत संदेश जाएगा। उन्होंने महिलाओं से अपील की कि वे इस फैसले के विरोध में एकजुट होकर अपनी आवाज उठाए। वामपंथी नौजवान संगठन के दिव्या भगत ने इस निर्णय को 'बेतुका' बताते हुए कहा कि महिलाओं पर भद्दे कमेंट करने वाले समाज के ठेकेदारों के असल ठेकेदार अब कौन है पता चलता है जब न्याय पीठ में बैठे न्यायाधीश भी महिलाओं के बारे में गलत सोच रखते हैं एक तरीके से किसी का यौन शोषण और रेप अटेम्प्ट करने को वैध बनाकर लाइसेंस बांट रहे हैं। ऐसी घृणित सोच पर शर्म आती है, इस पर गुस्सा करें या ऐसे लोगों को समाज से बाहर करें समझ में ही नहीं आता है। इस फैसले से समाज में एक नई बहस छिड़ गई है कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की रक्षा के लिए न्यायपालिका कितनी संवेदनशील है। महिला अधिकार संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम जनता का मत है कि इस प्रकार के फैसले पीड़ितों को न्याय दिलाने के बजाय अपराधियों को संरक्षण देने जैसा है। अतः यह आवश्यक है कि इस निर्णय की पुनः समीक्षा की जाए और महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।