शिक्षक दिवस पर बड़ा सवाल.. गांव के बच्चों को कब मिलेगी शहर जैसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा?
जादूगोड़ा से घाटशिला-गालूडीह तक बदली स्कूलों की तस्वीर, फिर भी शिक्षक और संसाधनों की कमी बनी चुनौती

*रिपोर्ट : सौरभ कुमार
जादूगोड़ा : 5 सितंबर को देशभर में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन शिक्षकों के योगदान और उनके सम्मान का प्रतीक है लेकिन इसके साथ ही शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर विचार करने का अवसर भी देता है। पूर्वी सिंहभूम के जादूगोड़ा, पोटका, घाटशिला, गालूडीह और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की स्थिति पिछले वर्षों की तुलना में बदली है। विद्यार्थियों को किताब, यूनिफॉर्म, मध्याह्न भोजन, साइकिल सहित कई सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके बावजूद बड़ा सवाल यह है कि क्या ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को शहरों के बच्चों के समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पा रही है? ग्रामीण सरकारी स्कूलों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में शिक्षकों की कमी, गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ और पर्याप्त संसाधनों का अभाव शामिल है। कई स्थानों पर शिक्षकों को एक से अधिक कक्षाओं की जिम्मेदारी संभालने के साथ सरकारी रिकॉर्ड और अन्य प्रशासनिक कार्य भी करने पड़ते हैं। इससे पढ़ाने के लिए मिलने वाला समय प्रभावित होता है और इसका सीधा असर विद्यार्थियों की शिक्षा पर पड़ सकता है। वर्तमान समय में डिजिटल शिक्षा को भी शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी सुविधाएं ग्रामीण बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ सकती हैं लेकिन इसके लिए पर्याप्त बिजली, तकनीकी सहयोग और प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता है। केवल उपकरण उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है, उनका नियमित और प्रभावी उपयोग भी जरूरी है। गालूडीह स्थित पीएमश्री कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में छात्राओं की संख्या के अनुपात में शिक्षकों और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की जरूरत का मुद्दा यह बताता है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल किताब और कक्षा तक सीमित नहीं है। सुरक्षित शौचालय, स्वच्छ पेयजल, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल सामग्री और बेहतर विद्यालय भवन भी बच्चों के समग्र विकास के लिए जरूरी हैं। दूसरी ओर निजी स्कूलों और ट्यूशन की बढ़ती लागत गरीब तथा मध्यमवर्गीय परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रही है। अधिकांश अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेजी, कंप्यूटर और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में आगे बढ़ें लेकिन हर परिवार महंगी शिक्षा का खर्च वहन करने में सक्षम नहीं है। ऐसे में सरकारी स्कूलों की शैक्षणिक गुणवत्ता को मजबूत करना बेहद जरूरी हो जाता है। शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं। वे बच्चों को सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते बल्कि उनमें आत्मविश्वास, सवाल पूछने की क्षमता और बड़े सपने देखने का साहस भी पैदा करते हैं। इसलिए बेहतर शैक्षणिक परिणाम की अपेक्षा के साथ शिक्षकों को पर्याप्त संख्या, प्रशिक्षण, शिक्षण सामग्री और पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय देना भी आवश्यक है। शिक्षक दिवस पर वास्तविक सम्मान तभी माना जाएगा जब गांव का बच्चा खुद को शहर के बच्चे से कम न समझे। इसके लिए शिक्षक-छात्र अनुपात सुधारने, विषयवार शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने, डिजिटल संसाधनों को प्रभावी बनाने, स्कूल विकास की राशि समय पर उपलब्ध कराने और शिक्षकों को अनावश्यक गैर-शैक्षणिक कार्यों से राहत देने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। क्योंकि बच्चा गरीब हो सकता है लेकिन उसका सपना गरीब नहीं होना चाहिए। उस सपने को उड़ान देने वाला सबसे मजबूत हाथ आज भी शिक्षक का ही है।