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हूल दिवस पर राजनगर में उमड़ा जनसैलाब, सिद्धो-कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर वीर शहीदों को किया नमन

रिपोर्ट: MANISH 2 दिन पहलेझारखण्ड

कृष्णा बास्के बोले- सिद्धो-कान्हू का संघर्ष आज भी प्रेरणा, कालीपद सोरेन ने युवाओं से संस्कृति और विरासत बचाने का किया आह्वान

हूल दिवस पर राजनगर में उमड़ा जनसैलाब, सिद्धो-कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर वीर शहीदों को किया नमन

राजनगर : सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत कुमडीह गांव में मंगलवार को आकिल आखड़ा जियाड़ कुमडीह के तत्वावधान में 171वां वीर शहीद सिद्धो-कान्हू हूल दिवस श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में वीर सिद्धो-कान्हू, चाँद-भैरव तथा फूलो-झानो के अद्वितीय बलिदान को स्मरण करते हुए उनके बताए मार्ग पर चलने का सामूहिक संकल्प लिया गया। इस अवसर पर शिक्षा, सामाजिक एकजुटता और जल, जंगल, जमीन की रक्षा के प्रति लोगों को जागरूक किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय सदस्य कृष्णा बास्के तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में सांसद प्रतिनिधि कालीपद (केपी) सोरेन, केंद्रीय सदस्य विशु हेंब्रम, बुद्धिजीवी मोर्चा के जिलाध्यक्ष दुर्गालाल मुर्मू, प्रखंड अध्यक्ष रामसिंह हेंब्रम, सोनाराम मुर्मू, भुकतू मार्डी सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत राजनगर एवं कुमडीह में स्थापित वीर सिद्धो-कान्हू की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण और श्रद्धासुमन अर्पित कर की गई। अपने संबोधन में कृष्णा बास्के ने कहा कि वीर सिद्धो-कान्हू, चाँद-भैरव और फूलो-झानो ने भोगनाडीह की धरती से अंग्रेजी हुकूमत, महाजनी प्रथा और शोषण के विरुद्ध ऐतिहासिक हूल आंदोलन का बिगुल फूंका था। उनके संघर्ष और बलिदान की बदौलत आदिवासी समाज के जल, जंगल, जमीन और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए सीएनटी एवं एसपीटी एक्ट जैसे महत्वपूर्ण कानून अस्तित्व में आए। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में समाज की लड़ाई तीर-धनुष से नहीं बल्कि शिक्षा, जागरूकता और कलम की ताकत से लड़ी जाएगी। यदि समाज को मजबूत बनाना है तो हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलानी होगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा ही अधिकारों की रक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम है और समाज को संगठित होकर नई पीढ़ी को शिक्षित बनाने की दिशा में कार्य करना चाहिए। विशिष्ट अतिथि सांसद प्रतिनिधि कालीपद (केपी) सोरेन ने कहा कि संथाल हूल के 171 वर्ष पूरे होने पर हमें अपने पूर्वजों के संघर्ष, त्याग और बलिदान से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार पूर्वजों ने जल, जंगल, जमीन और अस्तित्व की रक्षा के लिए अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया था, उसी प्रकार आज भी समाज को ईचा डैम जैसी परियोजनाओं से उत्पन्न विस्थापन और अन्य चुनौतियों के विरुद्ध लोकतांत्रिक तरीके से एकजुट होकर अपने अधिकारों की रक्षा करनी होगी। उन्होंने कहा कि बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना ही वीर शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। कार्यक्रम के दौरान आयोजित रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने लोगों का मन मोह लिया। पांच अलग-अलग टीमों ने संथाली नाटक के माध्यम से सिद्धो-कान्हू के ऐतिहासिक हूल विद्रोह की गाथा का प्रभावशाली मंचन किया। कलाकारों की जीवंत प्रस्तुति ने दर्शकों को भावुक कर दिया और पूरा वातावरण वीरता, गौरव और आदिवासी अस्मिता के भाव से ओत-प्रोत हो उठा। पारंपरिक नृत्य एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने आयोजन को और भी आकर्षक बना दिया। इस अवसर पर सुबल महतो, दिलीप महतो, रवि सोरेन, सचिन हेंब्रम, भोगला मुर्मू, राजेन मुर्मू, लबिन मुर्मू, सीलु मुर्मू, लखिन्द्र लोहार, सुधीर हांसदा, विष्णु हेंब्रम, पालू मुर्मू सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आदिवासी समाज के लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन समाज की एकता, शिक्षा के प्रसार और वीर शहीदों के आदर्शों पर चलते हुए न्यायपूर्ण एवं समृद्ध समाज के निर्माण के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ।

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