वीडियो वायरल कर छवि धूमिल करने का आरोप, अभिषेक मिश्रा पर कानूनी कार्रवाई की तैयारी
आईटी एक्ट, मानहानि और चुनावी कानूनों के तहत होगी कार्रवाई, साइबर सेल में शिकायत की तैयारी

सरायकेला : नगर पंचायत अध्यक्ष पद के चुनावी माहौल के बीच एक कथित वीडियो वायरल होने से राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। मामला उस समय तूल पकड़ गया जब इंडिया न्यूज़ वायरल बिहार-झारखंड के कोल्हान ब्यूरो प्रमोद सिंह द्वारा झामुमो समर्थित उम्मीदवार एवं पूर्व नगर पंचायत उपाध्यक्ष मनोज चौधरी के प्रचार हेतु एक वीडियो रिकॉर्ड किया जा रहा था। आरोप है कि वीडियो रिकॉर्डिंग के दौरान समर्थक को बयान देने से पहले भाषा शैली समझाने की सामान्य प्रक्रिया को किसी अज्ञात व्यक्ति ने रिकॉर्ड कर लिया और उसे भ्रामक तरीके से प्रस्तुत किया गया। बताया जा रहा है कि उक्त वीडियो बाद में अभिषेक मिश्रा नामक व्यक्ति के पास पहुंचा जिसने स्वयं को न्यूज़ पोर्टल का संपादक बताते हुए उसे अपने पोर्टल और यूट्यूब चैनल पर प्रसारित कर दिया। आरोप है कि वीडियो को इस प्रकार पेश किया गया जिससे प्रमोद सिंह, मनोज चौधरी और झामुमो की छवि को नुकसान पहुंचे। संबंधित पक्षों का कहना है कि यह सुनियोजित दुष्प्रचार है और चुनाव को प्रभावित करने की मंशा से किया गया है। कानूनी जानकारों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को जानबूझकर क्षति पहुंचाने के उद्देश्य से भ्रामक या अधूरी जानकारी प्रसारित की जाती है तो यह भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 के तहत आपराधिक मानहानि का मामला बन सकता है जिसमें दो वर्ष तक की सजा या जुर्माने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त ऑनलाइन माध्यम से भ्रामक या आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करना सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत दंडनीय हो सकता है। साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वीडियो को तोड़-मरोड़कर या भ्रामक शीर्षक के साथ अपलोड किया गया है तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ साइबर सेल में प्राथमिकी दर्ज कराई जा सकती है। चुनावी संदर्भ में यह मामला और भी गंभीर हो जाता है। यदि यह सिद्ध होता है कि वीडियो का उद्देश्य मतदाताओं को भ्रमित करना या चुनाव परिणाम को प्रभावित करना था तो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधान भी लागू हो सकते हैं। आचार संहिता उल्लंघन की शिकायत जिला निर्वाचन पदाधिकारी एवं चुनाव आयोग को दी जा सकती है। सूत्रों के अनुसार संबंधित पक्ष द्वारा वीडियो के स्क्रीनशॉट, लिंक और अन्य डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित कर लिए गए हैं। जल्द ही साइबर थाना में लिखित शिकायत दर्ज कराई जाएगी तथा यूट्यूब और पोर्टल संचालक को विधिक नोटिस भेजा जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर सिविल न्यायालय में क्षतिपूर्ति एवं वीडियो हटाने हेतु स्थगन आदेश (इंजंक्शन) की भी मांग की जाएगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनावी माहौल में सोशल मीडिया का दुरुपयोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर चुनौती है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह न केवल पत्रकारिता की आड़ में दुष्प्रचार का मामला होगा बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा। फिलहाल संबंधित पक्षों ने स्पष्ट किया है कि वे कानूनी प्रक्रिया के तहत ही आगे बढ़ेंगे और सत्य को सामने लाने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे। अब देखना यह है कि जांच और कानूनी कार्रवाई के बाद इस पूरे प्रकरण में क्या तथ्य सामने आते हैं।