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87 लाख मुआवजा भुगतान नहीं करने पर सख्त हुई अदालत, उपायुक्त रामगढ़ की चल संपत्ति कुर्क करने का आदेश

रिपोर्ट: VBN News Desk1 घंटे पहलेझारखण्ड

सरकारी वाहन तक जब्त करने के निर्देश, 40 साल पुराने भूमि अधिग्रहण मामले में न्यायालय का बड़ा फैसला

87 लाख मुआवजा भुगतान नहीं करने पर सख्त हुई अदालत, उपायुक्त रामगढ़ की चल संपत्ति कुर्क करने का आदेश

रामगढ़ : न्यायमंडल की अदालत ने एक पुराने भूमि अधिग्रहण मुआवजा मामले में बड़ा और सख्त आदेश जारी करते हुए उपायुक्त रामगढ़ की चल संपत्ति कुर्क करने का निर्देश दिया है। यह आदेश रामगढ़ के सिविल जज सीनियर डिवीजन द्वितीय सह विशेष न्यायाधीश एलए शिवेंदु द्विवेदी की अदालत द्वारा पारित किया गया। अदालत के इस फैसले के बाद प्रशासनिक महकमे में हलचल तेज हो गई है। मामला लैंड रेफरेंस केस संख्या 26/1986 तथा लैंड एक्विजिशन एग्जीक्यूशन केस संख्या 4/2004 से जुड़ा हुआ है जिसे रामगढ़ न्यायमंडल के सबसे पुराने भूमि अधिग्रहण निष्पादन मामलों में माना जा रहा है। जानकारी के अनुसार, अवार्डधारक को मूल मुआवजा राशि के साथ 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का भुगतान किया जाना था लेकिन लंबे समय बीत जाने के बावजूद भुगतान नहीं किया गया। वर्तमान में बकाया राशि बढ़कर लगभग 87 लाख 43 हजार 824 रुपये 73 पैसे पहुंच चुकी है। न्यायालय ने मामले में गंभीर रुख अपनाते हुए बैलिफ को उपायुक्त रामगढ़ की चल संपत्तियों को कुर्क करने का आदेश दिया है। अदालत के निर्देश में सरकारी वाहन सहित कार्यालय और आवास में मौजूद अन्य चल संपत्तियों को भी कुर्की की प्रक्रिया में शामिल करने की बात कही गई है। साथ ही न्यायालय ने कुर्की वारंट के निष्पादन की रिपोर्ट 25 मई तक प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। कानूनी जानकारों के अनुसार प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ इस प्रकार का सख्त कदम सामान्य परिस्थितियों में नहीं उठाया जाता। आमतौर पर तब न्यायालय को कठोर आदेश जारी करना पड़ता है जब लंबे समय तक अदालत के आदेशों की अनदेखी की जाती है या मुआवजा भुगतान लंबित रखा जाता है। ऐसे मामलों में अदालत का यह रुख न्यायपालिका की सख्ती और आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के रूप में देखा जा रहा है। स्थानीय स्तर पर भी इस आदेश की व्यापक चर्चा हो रही है। लोगों का कहना है कि वर्षों से लंबित मुआवजा मामलों में यदि समय पर कार्रवाई नहीं होती है तो प्रभावित लोगों को भारी आर्थिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ती है। अदालत के इस फैसले को न्यायिक जवाबदेही और प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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