ओसीएल विस्थापितों के हक और रोजगार की मांग तेज, प्रेम मार्डी ने प्रशासन से 15 दिनों में कार्रवाई की मांग
जमीन देने वाले ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित, जेएलकेएम नेता प्रेम मार्डी ने कंपनी प्रबंधन को चेताया

कांड्रा : सरायकेला-खरसावां जिले के कांड्रा, रघुनाथपुर स्थित ओसीएल आयरन एंड स्टील लिमिटेड (पूर्व नीलांचल कंपनी) के विस्थापित एवं प्रभावित ग्रामीणों की समस्याओं को लेकर झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) ने आवाज बुलंद की है। पार्टी के केंद्रीय उपाध्यक्ष एवं आंदोलन के नेतृत्वकर्ता प्रेम मार्डी के नेतृत्व में विस्थापित ग्रामीणों ने उपायुक्त को आवेदन सौंपकर रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और ग्रामीण विकास से जुड़ी समस्याओं के समाधान की मांग की है। आवेदन के अनुसार वर्ष 2002 में कंपनी ने औद्योगिक स्थापना के लिए स्थानीय रैयतों से लगभग 90 हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से जमीन अधिग्रहित की थी। उस समय जमीन देने वाले परिवारों के बदले 131 लोगों को नियोजन देने का आश्वासन दिया गया था। वर्तमान में कंपनी ओसीएल आयरन एंड स्टील लिमिटेड के नाम से संचालित है लेकिन विस्थापित परिवारों का आरोप है कि वर्षों बाद भी रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं बनी हुई हैं। ग्रामीणों ने विस्थापित ग्राम समिति के गठन एवं प्रशासनिक मान्यता, कंपनी में नई नियुक्तियों में समिति की सहभागिता और योग्य विस्थापित परिवारों को प्राथमिकता देने की मांग की है। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण के दस्तावेज, मुआवजा भुगतान और 131 लोगों को नियोजन देने के आश्वासन का रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग की गई है। आवेदन में मृत कर्मचारियों के आश्रितों को नौकरी, स्थायी कर्मचारियों के लिए वैकल्पिक मेडिकल सुविधा, सेवानिवृत्त कर्मियों को पेंशन, पीएफ और ग्रेच्युटी, ठेका मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी तथा प्रभावित गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क और परिवहन सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग भी शामिल है। जेएलकेएम केंद्रीय उपाध्यक्ष प्रेम मार्डी ने कहा कि जिन ग्रामीणों ने उद्योग स्थापना के लिए अपनी जमीन दी, आज उन्हीं परिवारों को रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उन्होंने प्रशासन और कंपनी प्रबंधन से 15 दिनों के भीतर ठोस पहल करने तथा विस्थापित प्रतिनिधियों के साथ संयुक्त बैठक बुलाने की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी कि मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई नहीं होने पर विस्थापित ग्रामीण अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलन करने को बाध्य होंगे।