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दुमका के दिसोम जाहेर थान में आस्था और परंपरा के साथ मनाया गया दिसोम बाहा पर्व

रिपोर्ट: VBN News Desk9 घंटे पहलेझारखण्ड

युवाओं की सहभागिता ने आयोजन में नई ऊर्जा का संचार किया।

दुमका के दिसोम जाहेर थान में आस्था और परंपरा के साथ मनाया गया दिसोम बाहा पर्व

दुमका : संताल समुदाय के प्रमुख पारंपरिक पर्वों में से एक दिसोम बाहा पर्व इस वर्ष भी पूरे विधि-विधान, आस्था और उल्लास के साथ दुमका स्थित दिसोम जाहेर थान में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का नेतृत्व दिसोम मांझी बाबा बीनीलाल टुडू ने किया, जबकि धार्मिक अनुष्ठानों की अगुवाई दिसोम नायकी बाबा सीताराम सोरेन ने की। 8.jpg पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ हुई शुरुआत प्रातः लगभग 8 बजे नायकी बाबा स्नान कर पवित्र वेशभूषा में जाहेर थान पहुंचे। मरांग बुरू भक्तों की उपस्थिति में जाहेर ऐरा, गोसाई ऐरा, ठाकुर जी, मोड़ेंकु तुरूयकु एवं मरांग बुरू सहित संताल आस्था के प्रमुख इष्ट देवताओं का आह्वान किया गया। पारंपरिक रीति के अनुसार मुर्गा की बलि दी गई, जिसे संताल धर्म में सामुदायिक आस्था और प्रकृति के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। बलि के उपरांत मुर्गा से खिचड़ी तैयार की गई, जिसे प्रसाद स्वरूप श्रद्धालुओं के बीच वितरित किया गया। श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया और सामूहिक प्रार्थना की।

बाहा गीतों और नृत्य से गूंजा परिसर पूजा-अर्चना के बाद वातावरण पूरी तरह सांस्कृतिक उल्लास में बदल गया। बाहा गीतों की मधुर धुन पर पारंपरिक बाहा नृत्य प्रस्तुत किया गया। पुरुष और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में कतारबद्ध होकर नृत्य करते नजर आए। ढोल, मांदर और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर पूरा जाहेर थान गूंज उठा। सैकड़ों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालु इस सांस्कृतिक उत्सव के साक्षी बने।

प्रकृति पूजा का पर्व है बाहा नायकी बाबा सीताराम सोरेन ने पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बाहा संताल समुदाय का दूसरा सबसे बड़ा और अत्यंत पवित्र पर्व है। यह फागुन मास में मनाया जाता है और प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का अवसर होता है। उन्होंने बताया कि ‘बाहा’ का अर्थ ‘फूल’ होता है। जब जंगलों में सखुआ (साल) और महुआ के पेड़ों पर नए फूल खिलते हैं, तब यह पर्व प्रारंभ होता है। इस दौरान नायके (पुजारी) के नेतृत्व में जाहेर थान में सखुआ और महुआ के फूलों से पूजा-अर्चना की जाती है। इस पर्व की एक खास परंपरा है—एक-दूसरे पर शुद्ध जल छिड़ककर प्रेम, भाईचारा और सामुदायिक एकता का संदेश देना। यह त्योहार मनुष्य और प्रकृति के अटूट संबंध का प्रतीक माना जाता है।

विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालु दिसोम बाहा पर्व में संताल परगना के विभिन्न हिस्सों से आए आतो मोड़ें होड़ और मरांग बुरू भक्तों की भागीदारी रही। आसपास के गांवों के ग्रामीणों के साथ-साथ विभिन्न कल्याण छात्रावासों में रह रहे छात्रों ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। युवाओं की सहभागिता ने आयोजन में नई ऊर्जा का संचार किया। प्रमुख उपस्थिति इस अवसर पर चुंडा सोरेन ‘सिपाही’, टेकलाल मरांडी, अशोक हांसदा, इंद्रजीत हेंब्रम, बी.डी. किस्कू, चंद्रनाथ हेंब्रम, नीलेश हांसदा, रामप्रसाद हांसदा, मोहन टुडू, दशमत किस्कू, शिवकांत मुर्मू, प्रेम हांसदा, संदीप मुर्मू, संदीप हांसदा, साहेबराम किस्कू, शीतल मरांडी, झुमरी सोरेन, मोनोदी सोरेन, लवकिशोर टुडू, सन्नी बेसरा सहित सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।

परंपरा और संस्कृति का संरक्षण दिसोम बाहा पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि संताल समाज की सांस्कृतिक पहचान और प्रकृति से उसके गहरे संबंध को भी दर्शाता है। बदलते समय में भी इस पर्व का सामूहिक रूप से आयोजन समुदाय की एकजुटता और परंपराओं के संरक्षण का जीवंत उदाहरण है।

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