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तालाब पर तालाब और फिर उसी का जीर्णोद्धार, नाली योजना भी अधूरी, सरकारी राशि के उपयोग की निष्पक्ष जांच की मांग

रिपोर्ट: अकरम 1 घंटे पहलेझारखण्ड

100 मीटर में सिमटा विकास! भालू डेरा में चार योजनाओं पर उठे सवाल, पंचायत के अन्य इलाके अब भी इंतजार में

तालाब पर तालाब और फिर उसी का जीर्णोद्धार, नाली योजना भी अधूरी, सरकारी राशि के उपयोग की निष्पक्ष जांच की मांग

बरवाडीह, लातेहार : उक्कामाड़ पंचायत के भालू डेरा गांव में संचालित विकास योजनाएं इन दिनों ग्रामीणों के बीच चर्चा और विवाद का विषय बनी हुई हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत के समग्र विकास के बजाय अधिकांश योजनाओं को मात्र 100 मीटर के दायरे में केंद्रित कर दिया गया है। एक ही क्षेत्र में तीन तालाब निर्माण एवं जीर्णोद्धार योजनाओं के साथ एक नाली निर्माण योजना स्वीकृत होने से सरकारी धन के उपयोग, योजना चयन और क्रियान्वयन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार पंचायत के कई गांव और टोले आज भी सड़क, जलनिकासी, सिंचाई और अन्य मूलभूत सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं जबकि भालू डेरा के एक सीमित क्षेत्र में लगातार योजनाएं स्वीकृत की जा रही हैं। लोगों का कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरे पंचायत का विकास इसी 100 मीटर क्षेत्र तक सीमित होकर रह गया हो। ग्रामीणों ने बताया कि लगभग दो वर्ष पूर्व भूमि संरक्षण विभाग द्वारा एक तालाब का निर्माण कराया गया था। वर्तमान में भी उस तालाब में पर्याप्त पानी मौजूद है और उसका उपयोग हो रहा है। इसके बावजूद उसी तालाब को जिला परिषद मद से लगभग 4.03 लाख रुपये की लागत वाली जीर्णोद्धार योजना में शामिल कर दिया गया। ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि जब तालाब कार्यशील अवस्था में है, तो उसके जीर्णोद्धार की आवश्यकता किस आधार पर महसूस की गई। इसी क्षेत्र में सांसद मद से लगभग एक वर्ष पूर्व एक अन्य तालाब निर्माण कराया गया था। ग्रामीणों का आरोप है कि जिस स्थान को कागजों में तालाब बताया गया वह आज भी खेत जैसा दिखाई देता है। लोगों का कहना है कि यदि किसी योजना पर सरकारी राशि खर्च हुई है तो उसका भौतिक स्वरूप स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए। आरोप है कि उसी स्थान से निकाली गई मिट्टी को पुराने तालाब के किनारों पर डालकर जीर्णोद्धार कार्य दर्शाया जा रहा है। ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि जिला परिषद की योजना स्थल पर सूचना पट्ट (Display Board) तक नहीं लगाया गया है। जबकि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन संबंधी दिशा-निर्देशों के अनुसार योजना की लागत, स्वीकृति संख्या, कार्य अवधि, कार्यकारी एजेंसी तथा संबंधित पदाधिकारियों की जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना आवश्यक माना जाता है। सूचना पट्ट नहीं होने से आम लोगों को योजना संबंधी जानकारी प्राप्त नहीं हो पा रही है। इसी क्षेत्र में एक नाली निर्माण योजना भी स्वीकृत है लेकिन ग्रामीणों के अनुसार अब तक उस पर कार्य प्रारंभ नहीं हुआ है। इससे योजनाओं की निगरानी और समयबद्ध क्रियान्वयन को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अधिकांश योजनाओं की निर्धारित कार्य अवधि लगभग दो माह थी जो समाप्त हो चुकी है। इसके बावजूद संबंधित विभाग की ओर से कार्य को निर्माणाधीन बताया जा रहा है। जब इस संबंध में कनीय अभियंता अभय मिश्रा से जानकारी ली गई तो उन्होंने कार्य प्रगति पर होने की बात कही जबकि स्थानीय लोगों का दावा है कि कई कार्य या तो अधूरे हैं या केवल औपचारिकता तक सीमित हैं। ग्रामीणों ने पंचायती राज अधिनियम, वित्तीय पारदर्शिता के प्रावधानों, ग्रामीण विकास विभाग के गुणवत्ता मानकों तथा सार्वजनिक सूचना प्रदर्शन संबंधी नियमों का हवाला देते हुए पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि योजनाओं का चयन आवश्यकता के आधार पर होना चाहिए न कि किसी एक सीमित क्षेत्र में बार-बार स्वीकृति देकर सरकारी राशि खर्च करने के लिए। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, जिला परिषद एवं संबंधित विभाग से बरसात शुरू होने से पहले सभी योजनाओं की तकनीकी और वित्तीय जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते जांच नहीं हुई तो बारिश के बाद कई कार्यों की वास्तविक स्थिति सामने आने के बजाय मिट्टी और पानी के साथ सच्चाई भी बह सकती है। अब क्षेत्रवासियों की निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

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