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यूसीआईएल अधिकारियों की पसंद का बाजार खुद बदहाल, कीचड़ में सब्जियां बेचने को मजबूर किसान

रिपोर्ट: VBN News Desk1 घंटे पहलेझारखण्ड

टूटा शेड, जलजमाव और बदहाल व्यवस्था से जूझ रहा जादूगोड़ा बाजार, सम्मानजनक सुविधा की आस में अन्नदाता

यूसीआईएल अधिकारियों की पसंद का बाजार खुद बदहाल, कीचड़ में सब्जियां बेचने को मजबूर किसान

जादूगोड़ा (सौरभ कुमार) : जादूगोड़ा स्थित यूसीआईएल कॉलोनी का साप्ताहिक हाट-बाजार (जहां से यूसीआईएल के अधिकारी और स्थानीय लोग नियमित रूप से सब्जियां खरीदते हैं) आज खुद बदहाली का शिकार है। गुरुवार और रविवार को लगने वाला यह बाजार वर्षों से आसपास के किसानों की आजीविका का प्रमुख केंद्र रहा है लेकिन मूलभूत सुविधाओं के अभाव में किसान कीचड़ और बारिश के बीच अपनी उपज बेचने को मजबूर हैं। बारिश शुरू होते ही बाजार परिसर दलदल में बदल जाता है। जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं होने से पूरे बाजार में पानी भर जाता है। किसान अपने घरों से प्लास्टिक लाकर जमीन पर बिछाते हैं और उसी पर बैठकर सब्जियां बेचते हैं। खरीदारों को भी कीचड़ से होकर गुजरना पड़ता है जिससे कई लोग बिना खरीदारी किए ही लौट जाते हैं। इसका सीधा नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है। स्थिति को और गंभीर बनाता है किसानों के लिए वर्षों पहले बनाया गया शेड, जो अब जर्जर होकर लगभग बेकार हो चुका है। टीन की चादरें उड़ चुकी हैं और बारिश या धूप से बचाव की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं बची है। इस बाजार में जादूगोड़ा, भाटिन, सांसपुर बगान, दुरकू बगान, कलकापुर, पोटका सहित आसपास के दर्जनों गांवों तथा पश्चिम बंगाल से भी किसान अपनी उपज लेकर पहुंचते हैं। छोटे किसान सीमित मात्रा में सब्जियां लाते हैं और परिवहन खर्च अधिक होने के कारण बड़े बाजारों तक नहीं जा पाते। दिनभर बिक्री नहीं होने पर किसानों को मजबूरी में अपनी सब्जियां बेहद कम कीमत पर बेचनी पड़ती हैं ताकि फसल खराब न हो। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह बाजार केवल व्यापार का केंद्र नहीं बल्कि सैकड़ों किसानों की रोजी-रोटी का आधार है। ग्रामीणों ने मांग की है कि बाजार में पक्का शेड, जल निकासी व्यवस्था, समतल फर्श, स्वच्छता और किसानों के बैठने की उचित व्यवस्था शीघ्र सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि किसानों को सम्मानजनक वातावरण में अपनी उपज बेचने का अधिकार मिलना चाहिए। यदि समय रहते बाजार की बदहाल स्थिति नहीं सुधारी गई तो यह ऐतिहासिक हाट धीरे-धीरे अपनी पहचान खो सकता है और किसानों की आजीविका पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।

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