ताज़ा-ख़बर

पशु-पक्षियों की पीड़ा पर कब जागेगा सिस्टम? लातेहार में बेजुबानों की मांग यात्रा बनी चर्चा का विषय

रिपोर्ट: Santosh Kumar10 घंटे पहलेझारखण्ड

प्यासे बेजुबानों की मौन रैली - समाहरणालय से पेयजल विभाग तक भटकते पशुओं ने झकझोरा शहर, पानी-बचाव और भोजन की मांग से उठा मानवीय सवाल

पशु-पक्षियों की पीड़ा पर कब जागेगा सिस्टम? लातेहार में बेजुबानों की मांग यात्रा बनी चर्चा का विषय

लातेहार : भीषण गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान के बीच गुरुवार को लातेहार समाहरणालय परिसर के आसपास एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने लोगों को भावुक भी किया और सोचने पर मजबूर भी। समाहरणालय गेट से लेकर पेयजल विभाग कार्यालय तक आवारा पशुओं ने प्रतीकात्मक रूप से मांग यात्रा निकाली। इस दौरान गाय, बछड़े, बैल और अन्य पशु सड़क किनारे भटकते हुए पेयजल विभाग की ओर पहुंचे मानो वे भीषण गर्मी में पानी, भोजन और संरक्षण की गुहार लगा रहे हों। इस अनोखे घटनाक्रम को देखने के लिए सड़क किनारे लोगों की भीड़ जुट गई। कई लोगों ने इसे बेजुबानों की मौन पुकार बताया। पशु कुछ देर तक पेयजल विभाग कार्यालय के समीप रुके रहे और फिर धीरे-धीरे वापस अपने ठिकानों की ओर लौट गए। हालांकि यह कोई संगठित प्रदर्शन नहीं था लेकिन शहरवासियों के बीच यह चर्चा का विषय बन गया कि आखिर इंसानों के बीच रहने वाले ये बेजुबान आखिर कब तक प्यास और भूख से तड़पते रहेंगे। स्थानीय लोगों का कहना है कि भीषण गर्मी में शहर के कई इलाकों में पशुओं के लिए पानी की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। सड़क किनारे घूम रहे मवेशी नालियों, गड्ढों या गंदे पानी से अपनी प्यास बुझाने को मजबूर हैं। कई पशु प्लास्टिक और कचरा खाकर बीमार पड़ रहे हैं। लोगों ने कहा कि जिस तरह इंसानों के लिए गर्मी में पानी के प्याऊ लगाए जाते हैं उसी तरह बेजुबान पशुओं के लिए भी सार्वजनिक स्थानों पर पानी और चारे की व्यवस्था होनी चाहिए। पक्षी प्रेमी और सामाजिक कार्यकर्ता अजय तिर्की ने कहा कि गर्मी सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों के लिए भी जानलेवा बन चुकी है। पेड़ों की कटाई और जलस्रोतों के सूखने से पक्षियों और जानवरों का जीवन संकट में पड़ गया है। उन्होंने लोगों से अपने घरों और दुकानों के बाहर पानी से भरे बर्तन रखने की अपील की। स्थानीय पत्रकार संतोष कुमार ने कहा कि शहरों में आवारा पशुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन उनके संरक्षण को लेकर कोई ठोस नीति नजर नहीं आती। उन्होंने कहा कि कई बार भूख और प्यास से परेशान पशु सड़क पर इधर-उधर भटकते हैं जिससे दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है। यदि नगर प्रशासन समय रहते गौशाला, जलपात्र और चारा केंद्र जैसी व्यवस्था करे तो इन बेजुबानों को राहत मिल सकती है। वन्यजीव और पशु व्यवहार के जानकार डॉ. मनोज कुमार ने बताया कि भीषण गर्मी में पशुओं के शरीर का तापमान तेजी से बढ़ता है। लंबे समय तक पानी नहीं मिलने पर वे डिहाइड्रेशन का शिकार हो जाते हैं जिससे उनकी मौत तक हो सकती है। उन्होंने कहा कि पशु बोल नहीं सकते लेकिन उनका व्यवहार उनकी तकलीफ बयां कर देता है। पानी की तलाश में इधर-उधर भटकना उसी पीड़ा का संकेत है। स्थानीय दुकानदारों ने बताया कि कई दिनों से समाहरणालय और बाजार क्षेत्र में आवारा पशु लगातार पानी की तलाश में भटक रहे हैं। कुछ लोग अपने स्तर पर उन्हें पानी पिला रहे हैं लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। लोगों का कहना है कि प्रशासन को सार्वजनिक स्थानों पर पशुओं के लिए स्थायी पानी टंकी और चारा केंद्र की व्यवस्था करनी चाहिए। इस दौरान कई युवाओं ने सोशल मीडिया पर पशुओं की तस्वीरें और वीडियो साझा करते हुए प्रशासन से संवेदनशील पहल की मांग की। लोगों ने कहा कि यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो गर्मी में कई बेजुबान जानवरों की जान जा सकती है। शहर के बुजुर्गों ने भी इस दृश्य को चिंताजनक बताते हुए कहा कि पहले गांवों और शहरों में तालाब, कुएं और पेड़ अधिक होते थे जिससे पशु-पक्षियों को राहत मिल जाती थी। लेकिन अब कंक्रीट के बढ़ते जंगल और जलस्रोतों के खत्म होने से जानवरों का जीवन संकट में है। लोगों ने जिला प्रशासन, नगर पंचायत और पेयजल विभाग से मांग की है कि शहर में विभिन्न स्थानों पर पशुओं के लिए पानी की टंकियां, चारा केंद्र और अस्थायी आश्रय स्थल बनाए जाएं। साथ ही लोगों से भी अपील की गई कि वे अपने घरों के बाहर पानी रखें और बेजुबानों के प्रति संवेदनशील बनें। गुरुवार को निकली यह प्रतीकात्मक मांग यात्रा भले ही कुछ देर की रही हो लेकिन उसने समाज के सामने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया कि क्या विकास और आधुनिकता की दौड़ में हम उन बेजुबानों को भूलते जा रहे हैं जो बिना कुछ कहे इंसानों के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं?

इन्हें भी पढ़ें.